Monday, April 29, 2013

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शनि ग्रह के अनुसार, साल 2016 आपके लिए कैसा रहेगा? इस राशिफल के माध्यम से आप जान पाएंगे इस साल उसके साथ क्या अच्छा होगा या कहां कब आपको परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
ज्योतिष शास्त्र में शनिदेव को न्याय का देवता माना गया है क्योंकि मनुष्यों को उनके अच्छे-बुरे कर्मों का दंड शनिदेव ही देते हैं। साल 2016 में शनि वृश्चिक राशि में चलायमान रहेगा। तुला, वृश्चिक व धनु राशि पर शनि की साढ़ेसाती व मेष, सिंह पर ढय्या का प्रभाव रहेगा। इस दौरान 25 मार्च से 13 अगस्त 2016 तक शनि की स्थिति वक्रीय रहेगी। जानिए साल 2016 में शनिदेव किस प्रकार आपकी राशि को प्रभावित करेंगे-

मेष राशि

साल 2016 में शनि वृश्चिक राशि में रहेगा। इस साल मेष राशि वालों पर शनि की ढय्या का प्रभाव रहेगा। आठवें स्थान की ढय्या विपरीत फल देने वाली रहेगी। काम-काज में रुकावटों व अड़चनों की स्थितियां बनेंगी। आठवें स्थान पर शनि होने से स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ सकता है। शत्रु आपको नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेंगे। पार्टनरशिप में नुकसान हो सकता है। व्यापार में अपनी सूझबूझ से आप मुनाफा बढ़ा लेंगे। किसी पर भी अधिक विश्वास न करें।
25 मार्च से 13 अगस्त 2016 के बीच शनि के वक्र स्थिति में रहने के कारण सर्जरी करवाने की स्थिति बन सकती है या फिर अन्य किसी कारण अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं। बॉस से किसी बात पर कहासुनी हो सकती है। किसी खास व्यक्ति से बिछड़ना हो सकता है। अपनी पूरी क्षमता व योग्यता का इस्तेमाल करने के बाद भी शनि की ढय्या के कारण परिणाम आशाजनक नहीं रहेंगे।

उपाय

1. सवा पांच रत्ती का नीलम या उपरत्न (नीली) सोना, चांदी या तांबे की अंगूठी में अभिमंत्रित करवा कर धारण करें।
2. शनि यंत्र के साथ नीलम या फिरोजा रत्न गले में लॉकेट की आकृति में पहन सकते हैं, यह उपाय भी उत्तम है।
3. किसी भी विद्वान ब्राह्मण से या स्वयं शनि के तंत्रोक्त, वैदिक मंत्रों के 23000 जाप करें या करवाएं। ये है शनि का तंत्रोक्त मंत्र-
ऊं प्रां प्रीं स: श्नैश्चराय नम:
4. शनिवार को व्रत रखें। चींटियों को आटा डालें।
5. जूते, काले कपड़े, मोटा अनाज व लोहे के बर्तन दान करें।


158 comments:

  1. सभी मित्रों को नाग पंचमी की मंगल कामनायें !!
    ये पावन दिवस आप सभी के जीवन में अनंत खुशियाँ लाये
    एवं आप की सभी कामनाये पूर्ण करे

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  2. 1 जिस जातक के जीवन में उपरोक्त लक्षण हैं, वह नागपंचमी के दिन किसी भी शिव मंदिर में नाग-नागिन का जोड़ा चढ़ा कर आ जाए। जोड़ा चांदी का, पंचधातु का, तांबे का या अष्ट धातु का हो।

    2 नागपंचमी के दिन ही शिव मंदिर में 1 माला शिव गायत्री का जाप (यथाशक्ति) करें एवं नाग-नागिन का जोड़ा चढ़ाएं तो पूर्ण लाभ मिलेगा।

    शिव गायत्री मंत्र :
    'ॐ तत्पुरुषाय विद्‍महे, महादेवाय धीमहि तन्नोरुद्र: प्रचोदयात्।'

    * आम दिनों में भी कालसर्प दोष से मुक्ति के उपाय किए जा सकते हैं। विशेषकर सोमवार को शिव मंदिर में जो जातक यह मंत्र चंदन की अगरबत्ती लगाकर एवं दीपक (तेल या घी) लगाकर जाप करता है, तो उसे अवश्य ही श्रेष्ठ फल प्राप्त होता है।

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  3. हर हिन्दू नागपंचमी पर नाग देवता की पूजा-अर्चना करता है लेकिन इस पूजा में अंधविश्वास है कि नाग को दूध पिलाने से नाग देवता प्रसन्न होते हैं। जबकि ऐसा नहीं है, नाग कभी भी दूध नहीं पीता बल्कि और भी कोई पेय नहीं पीता।

    यदि भुलवश दूध गले के नीचे उतरा तो नाग की मौत हो जाती है। जैसे हमारे फेफड़ों में कुछ भी चला जाए तो मृत्यु का कारण बन जाता है। ऐसी पूजा किस काम कि जिससे फल मिलने के बजाए नाग देवता की मृत्यु का दोष लगकर हम शापित हो जाएं।

    नाग देवता को कोयले से घर के द्वार पर चित्राकृति में बनाने का भी चलन है। यदि शुद्ध गाय के घी से नाग की चित्राकृति बना कर उसकी पूजा की जाए तो फल कई गुना बढ़ जाता है।

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  4. कालसर्प दोष को लेकर लोगों में काफी भय और आशंका-कुशंकाएं रहती हैं, लेकिन कुछ आसान और अचूक उपायों से इसके असर को कम कियाकालसर्प दोष को लेकर लोगों में काफी भय और आशंका-कुशंकाएं रहती हैं, लेकिन कुछ आसान और अचूक उपायों से इसके असर को कम किया जा सकता है। कोई इसे कालसर्प दोष कहता है तो कोई योग। कोई इसे मानता है और कोई नहीं, लेकिन कुंडली के शोध से पता चलता है कि जिनकी भी कुंडली में यह दोष पाया गया है, उसका जीवन या तो रंक जैसे गुजरता है या फिर राजा जैसा।कालसर्प योग से मुक्ति के लिए बारह ज्योतिर्लिंग के अभिषेक एवं शांति का विधान बताया गया है। यदि द्वादश ज्योतिर्लिंग में से केवल एक नासिक स्थित त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग का नागपंचमी के दिन अभिषेक, पूजा की जाए तो इस दोष से हमेशा के लिए मुक्ति मिलती है। जो इसे न कर पाएं वह यह उपाय अवश्य करें।

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  5. ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान-ध्यान कर एक तांबे के लौटे में साफ जल भरें। जल में सूखी लाल मिर्ची के दानें डालें और यह जल सूर्य देव को अर्पित करें। ध्यान रहे जल चढ़ाते समय जिस स्थान पर स्थानांतरण कराना है उस स्थान का ध्यान करें। जल्दी ही आपकी इच्छा पूर्ण हो जाएगी।

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  6. यदि किसी को कड़ी मेहनत के बाद भी सफलता नहीं मिल पा रही है तो गृह स्थान के समीप किसी कुएं में या अन्य किसी जल स्रोत में कच्चा दूध डालने से शीघ्र लाभ प्राप्त होता है। यह एक अचूक उपाय है और इससे निश्चित ही सकारात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं।शिव अवतार श्रीहनुमान जी राहु और केतु के कष्टों से छुटकारा दिलाते हैं। इसलिए हनुमान उपासना भी बहुत शुभदायी है। हनुमानजी के स्मरण के लिए ये मंत्र जरूर बोलें -
    हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट्।
    - शिव के ही अंश बटुक भैरव की आराधना से भी इस दोष से बचाव हो सकता है।
    हीं बटुकाय आपदुदारणाय कुरु कुरु बटुकाय हीं।

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  7. कालसर्प योग के दोष से मुक्ति के लिए नागों के देवता भगवान शिव की भक्ति और आराधना सबसे श्रेष्ठ उपाय है, जिसके लिए शिव पंचाक्षरी का स्मरण आसान व असरदार माना गया है। यह मंत्र है-
    ऊँ नम: शिवाय।

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  8. जानिए जिन लोगों की कुंडली मीन लग्न की है और उसके तृतीय या चतुर्थ भाव में गुरु स्थित है तो व्यक्ति के जीवन पर क्या-क्या प्रभाव पड़ते हैं...
    मीन लग्न की कुंडली के तृतीय भाव में गुरु हो तो...
    जिन लोगों की कुंडली मीन लग्न की है और उसके तृतीय भाव में गुरु स्थित है तो व्यक्ति को भाई-बहनों की ओर से पूर्ण सुख एवं सहयोग नहीं मिल पाता है। अधिकांश समय में इनके बीच वैचारिक मतभेद चलते रहते हैं। कुंडली का तीसरा... भाव भाई-बहन एवं पराक्रम का कारक स्थान होता है। जबकि मीन लग्न में इस स्थान वृष राशि का स्वामी शुक्र है। शुक्र को असुरों का गुरु माना गया है और बृहस्पति देव को देवताओं का गुरु माना जाता है। शुक्र की इस राशि में गुरु होने पर व्यक्ति पिता से भी तालमेल नहीं बैठा पाता है।
    मीन लग्न की कुंडली के चतुर्थ भाव में गुरु हो तो...
    कुंडली का चौथा भाव माता एवं भूमि-भवन का कारक स्थान होता है। मीन लग्न की कुंडली में इस स्थान मिथुन राशि का स्वामी बुध है। बुध की इस राशि में गुरु होने पर व्यक्ति को शारीरिक सौंदर्य पूर्ण रूप से प्राप्त होता है। माता की ओर से सहयोग मिलता है और इसी वजह से धन संबंधी कार्यों में इन्हें विशेष सफलता प्राप्त होती है। कभी-कभी अधिक खर्च के कारण असंतोष बना रहता है।

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  9. श्रावण मास की पूर्णिमा को रक्षा बंधन का पर्व मनाया जाता है। रक्षा-बंधन दो शब्दों से मिल कर बना है- रक्षा और बंधन। रक्षा का अर्थ है बचाना, सावधानी, सुरक्षा और बंधन का अर्थ है जिससे बांधा जाए। अर्थात् सुरक्षा के भाव से किसी से जुडऩा रक्षाबंधन है।
    संस्कृत शब्द रक्षिका का अपभ्रंश शब्द राखी है। इसका अर्थ होता है रक्षा करना। हमें सुरक्षा मिलती है- प्रज्ञा से, प्रेम से, पवित्रता से। इन पर्वों पर हम वेद शिक्षा आरंभ करते हैं, यज्ञोपवीत पहनते हैं और रक्षासूत्र बंधवाते हैं। श्रावण पूर्णिमा को मनाए जाने वाला यह त्योहार भारतीय लोक जीवन में भाई-बहन के पवित्र स्नेह का प्रतीक है।
    किंतु इस दिन मात्र बहन ही भाइयों को राखी बांधती है, ऐसा आवश्यक नहीं है , बल्कि त्योहार मनाने के लिए धर्म के प्रति आस्था होना आवश्यक है। इसलिए इस पर्व में दूसरों की रक्षा के धर्म-भाव को विशेष महत्व दिया गया है। इस प्रकार यह दिन हमारी ज्ञान प्राप्ति की इच्छा और विचारों की पवित्रता के भाव को व्यक्त करता है।

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  10. शनिवार के दिन किसी हनुमान मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनि दोष की शांति के लिए हनुमानजी से प्रार्थना करें। बूंदी के लड्डू का भोग भी लगाएं।

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  11. शनिवार के दिन ग्यारह साबूत नारियल बहते हुए जल में प्रवाहित करें और शनिदेव से जीवन को सुखमय बनाने के लिए प्रार्थना करें।

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  12. प्रत्येक शनिवार को शाम के समय बड़(बरगद) और पीपल के पेड़ के नीचे सूर्योदय से पहले स्नान आदि करने के बाद कड़वे तेल का दीपक लगाएं और दूध एवं धूप आदि अर्पित करें।

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  13. यदि शनि की साढ़े साती, ढैय्या या महादशा चल रही हो तो इस दौरान मांस, मदिरा का सेवन भूलकर भी न करें। इससे भी शनिदेव अति प्रसन्न हो जाते हैं।

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  14. लाल चंदन की माला को अभिमंत्रित कर शनिवार या शनि जयंती के दिन पहनने से शनि के अशुभ प्रभाव कम हो जाते हैं।

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  15. जीवन में हमें अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कुछ परेशानियां स्वयं ही समाप्त हो जाती हैं जबकि कुछ समस्याओं के निदान के लिए विशेष प्रयास करने पड़ते हैं। तंत्र शास्त्र के माध्यम से जीवन की कई समस्याओं का निदान किया जा सकता है। गोमती चक्र एक ऐसा पत्थर है जिसका उपयोग तंत्र क्रियाओं में किया जाता है। यह बहुत ही साधारण सा दिखने वाला पत्थर है लेकिन इसका यह बहुत प्रभावशाली है। इसके कुछ प्रयोग इस प्रकार हैं-
    1- यदि बार-बार गर्भ गिर रहा हो तो दो गोमती चक्र लाल कपड़े में बांधकर कमर में बांध दें तो गर्भ गिरना बंद हो जाता है।
    2- यदि कोई कचहरी जाते समय घर के बाहर गोमती चक्र रखकर उस पर दाहिना पांव रखकर जाए तो उस दिन कोर्ट-कचहरी में सफलता प्राप्त होती है।
    3- यदि शत्रु बढ़ गए हों तो जितने अक्षर का शत्रु का नाम है उतने गोमती चक्र लेेकर उस पर शत्रु का नाम लिखकर उन्हें जमीन में गाड़ दें तो शत्रु परास्त हो जाएंगे।
    4- यदि पति-पत्नी में मतभेद हो तो तीन गोमती चक्र लेकर घर के दक्षिण में हलूं बलजाद कहकर फेंद दें, मतभेद समाप्त हो जाएगा।
    5- प्रमोशन नहीं हो रहा हो तो एक गोमती चक्र लेकर शिव मंदिर में शिवलिंग पर चढ़ा दें और सच्चे ह्रदय से प्रार्थना करें। निश्चय ही प्रमोशन के रास्ते खुल जाएंगे।
    6- व्यापार वृद्धि के लिए दो गोमती चक्र लेकर उसे बांधकर ऊपर चौखट पर लटका दें और ग्राहक उसके नीचे से निकले तो निश्चय ही व्यापार में वृद्धि होती है।
    7- यदि गोमती चक्र को लाल सिंदूर के डिब्बी में घर में रखें तो घर में सुख-शांति बनी रहती है।

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  17. जीवन में हमें अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कुछ परेशानियां स्वयं ही समाप्त हो जाती हैं जबकि कुछ समस्याओं के निदान के लिए विशेष प्रयास करने पड़ते हैं। तंत्र शास्त्र के माध्यम से जीवन की कई समस्याओं का निदान किया जा सकता है। गोमती चक्र एक ऐसा पत्थर है जिसका उपयोग तंत्र क्रियाओं में किया जाता है। यह बहुत ही साधारण सा दिखने वाला पत्थर है लेकिन इसका यह बहुत प्रभावशाली है। इसके कुछ प्रयोग इस प्रकार हैं-
    1- यदि बार-बार गर्भ गिर रहा हो तो दो गोमती चक्र लाल कपड़े में बांधकर कमर में बांध दें तो गर्भ गिरना बंद हो जाता है।
    2- यदि कोई कचहरी जाते समय घर के बाहर गोमती चक्र रखकर उस पर दाहिना पांव रखकर जाए तो उस दिन कोर्ट-कचहरी में सफलता प्राप्त होती है।
    3- यदि शत्रु बढ़ गए हों तो जितने अक्षर का शत्रु का नाम है उतने गोमती चक्र लेेकर उस पर शत्रु का नाम लिखकर उन्हें जमीन में गाड़ दें तो शत्रु परास्त हो जाएंगे।
    4- यदि पति-पत्नी में मतभेद हो तो तीन गोमती चक्र लेकर घर के दक्षिण में हलूं बलजाद कहकर फेंद दें, मतभेद समाप्त हो जाएगा।
    5- प्रमोशन नहीं हो रहा हो तो एक गोमती चक्र लेकर शिव मंदिर में शिवलिंग पर चढ़ा दें और सच्चे ह्रदय से प्रार्थना करें। निश्चय ही प्रमोशन के रास्ते खुल जाएंगे।
    6- व्यापार वृद्धि के लिए दो गोमती चक्र लेकर उसे बांधकर ऊपर चौखट पर लटका दें और ग्राहक उसके नीचे से निकले तो निश्चय ही व्यापार में वृद्धि होती है।
    7- यदि गोमती चक्र को लाल सिंदूर के डिब्बी में घर में रखें तो घर में सुख-शांति बनी रहती है।

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  18. ॐ नमो आदेश गुरुजी को आदेश माता भभूत पिता भभूत त्रिलोक तारिणी या भभूत किसने हाणी किसने छानी महादेव ने हाणी पार्वती ने छाणी !! स्यानौनाथ चौरासी सिद्धो की भभूत इस पिण्ड के मस्तिषक चढानी चढे भभूत धर्ती पडे धाऊ रक्षा करे गुरु गोरख राऊ !! भाग भाग रे शाकनि डाकनि मडी मसाणी दैत्य दानव राग – दाग शक्ति पाताल मीन मेखला को पुत्र उत्र हाको तेरो प्राण मै गाडो पांडवी बाण सरसों चेडा मैने साधी लंका जाये रावण बांधों कौउनिकी जिउदाल काल की पाती जाग जाग रे भैरों तीन त्रिलोकी नाथ हांकती डैणी वज्र मारो फांकती डैणी वज्र मारो अंम्बादी जंम्बादी डैणी वज्र मारो जल भूत को मारो थल भूत को मारो !!




    निंद्रा स्तभन तंत्र

    वृहती वृक्ष की जड मधु (शहद) के साथ घिसकर उसका नस्य लेने से निंद्र स्तभन होती है !!


    अथ विद्वेषण मंत्र

    ॐ नमो भगवती शमशान कालिके अमुकाऽमुकेन सह विद्वेषय विद्वेषय हन हन पच पच मथ मथ हुं फट् स्वाहा !!

    विधि – इस मंत्र से कडवे तेल में नीम, तिल, चावल मिलाकर खैर की लकडी को शमशान की अग्नि से जलाकर दस हजार आहुति देने से दोनों मे वैर भाव हो जाता है !!


    अथ स्त्री वशीकरण मंत्र

    ॐ आं ऐं भग भुगे भगोदरि भगमाले भगावहे भगगुह्ये भगयोने भगनिपातिनि सर्व भगवशंकरि भगरुपे नित्यक्लिन्ने भगस्वरुपे सर्व भगानि मह्यानय वरदे रेते सुरेते भगक्लिन्ने क्लिन्नद्रवे क्लेदय द्रावय अमोघे भगविच्चे क्षोभय क्षोभय सर्वसत्वान् भगेश्वरि ऐं ब्लूं जं ब्लूं में ब्लूं मौं ब्लूं हें ब्लूं हें क्लिन्ने सर्वाणि भगानि मे वशमानय स्त्रींहरल्बें ह्रीं भगमालिनि स्वाहा !!



    विधि - इस मंत्र का १०८ प्रतिदिन जप करने से स्त्री वशीकरण होता है !!


    अथ शैतान स्त्री वशीकरण मंत्र

    बड पीपल थान जहां बैठा अजाजील शैतान मेरी सबीह मेरीसी सूरत बन अमुकी (नाम) को जारा ना रानै तो अपनी बहन भानजी के सिर जान पग चलता अमीरान् जो न रानै तो धोबी की नाद चमार की खाल कलाल की माठी पड जो राजा चाहे राजा को मै चाहूं अपने काज को मेरा काम न होगा तो आनसीमें तेरा दामनगीर रहूंगा !!

    विधि – शनिवार से १२ (बारह) दिन तक अर्द्धरात्रि के समय नंगा हो १२ (बारह) राई को हाथ में ले कर प्रत्येक राई के उपर १२ (बारह) मंत्र पढकर अग्नि में डालें स्त्री साधक के प्रेम में वशीभूत हो हाजिर हो जायेगी !!

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  19. यदि कोई व्यक्ति बगैर किसी कारण के परेशान कर रहा हो, तो शौच क्रिया काल में शौचालय में बैठे-बैठे वहीं के पानी से उस व्यक्ति का नाम लिखें और बाहर निकलने से पूर्व जहां पानी से नाम लिखा था, उस स्थान पर अप बाएं पैर से तीन बार ठोकर मारें। ध्यान रहे, यहप्रयोग स्वार्थवश न करें, अन्यथा हानि हो सकती है।

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  20. शादी वाले दिन से एक दिन पहले एक ईंट के ऊपर कोयले से "बाधायें" लिखकर ईंट को उल्टा करके किसी सुरक्षित स्थान पर रख दीजिये,और शादी के बाद उस ईंट को उठाकर किसी पानी वाले स्थान पर डाल कर ऊपर से कुछ खाने का सामान डाल दीजिये,शादी विवाह के समय में बाधायें नहीं आयेंगी।

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  21. शनि के बुरे समय बचने का ये है अचूक उपाय.


    जानिए आपके घर में कौन सी दिशा है खतरनाक
    वास्तु के अनुसार घर के दक्षिणी भाग में किसी भी तरह का दोष होना सबसे ज्यादा परेशानी देने वाला माना जाता है। घर के दक्षिणी कोने में जितना ज्यादा वास्तु का ध्यान रखा जाता है। घर में उतनी ही अधिक समृद्धि रहती है। इसलिए जब भी घर बनवाये तो दक्षिण दिशा के वास्तु का विशेष ध्यान रखें क्योंकि वास्तु के अनुसार इस दिशा में किसी भी तरह का वास्तुदोष होने पर घर के सदस्यों को अकास्मिक दुर्घटना का सामना करना पड़ सकता है।
    - दक्षिणमुखी भूखण्ड पर मार्ग की ओर से भूखण्ड के सिरे से ही भवन का निर्माण करना चाहिए।
    - दक्षिणमुखी भूखण्ड पर बने भवन का जल उत्तर दिशा से निकास हो तो स्त्रियों को स्वास्थ्य लाभ के साथ धन लाभ भी होता है। यदि उत्तर दिशा से जल का निकास न हो सके तो पूर्व दिशा से जल का निकास होना। ऐसा करने पर पुरुष यशस्वी व स्वस्थ होंगे।
    - दक्षिण दिशा में भवन के सम्मुख टीले, पहाड़ी और कोई ऊंचा भवन हो तो शुभ फलदायी होता है।
    - भूखण्ड का दक्षिण भाग कभी भी नीचे न रखें, यदि रखेंगे तो घर की स्त्रियां अस्वस्थ, धन हानि और आकस्मिक मृत्यु का सामना करना पड़ेगा।
    - दक्षिण भाग में कभी भी कुआं या बोरिंग न करवाएं। ऐसा करने से धनहानि, दुर्घटना व आकस्मिक मृत्यु का सामना करना पड़ सकता है।
    - दक्षिण भाग में बनने वाले कक्षों के बरामदे या फर्श नीचा न बनाएं। कोशिश यही करें कि इस भाग में जो भी निर्माण करें वह पूर्व, उत्तर व ईशान दिशा की अपेक्षा ऊंचा हो।
    - दक्षिण भाग में खाली स्थान न छोड़ें यदि छोड़ें तो नाम मात्र का हो।
    - भवन निर्माण करते समय अन्य महत्वपूर्ण वास्तु सिद्धांतों का पालन अवश्य करें।


    क्या आपको भी हैं ये परेशानियां? ये 3 शनि मंत्र बोल करें दूर
    धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक शनि की दशा जैसे ढैय्या, साढ़े साती या महादशा में शनि ग्रह के अशुभ प्रभाव व्यावहारिक जीवन के अनेक कामों में बाधाएं पैदा कर सकती है। हिन्दू धर्म में शनिवार का दिन शनिदेव की उपासना से शनि ग्रह दोष शांति के लिए बहुत ही शुभ माना जाता है। परेशानियों से छुटकारे के लिए शास्त्रों में शनि के तीन मंत्र जप खासतौर पर प्रभावी माने गए हैं। जानते हैं इन शनि मंत्रों के अचूक असर से कौन-कौन सी पीड़ा दूर होती है और इन मंत्रों के जप की सरल विधि -

    - हर काम में नुकसान
    - विरोधी परेशानी का कारण बने हो
    - रोग में दवाई का असर नहीं कर रही हो
    - कारोबार में नाकामी
    - मेहनत के मुताबिक सफलता नहीं
    - संतान की असफलता
    - शनिवार के दिन नवग्रह या शनि मंदिर में बदन पर लाल लुंगी पहनकर भीगकर ही शनिदेव पर तेल चढ़ाते हुए इन तीन मंत्रों में से किसी की भी एक माला का जप करें -


    - ॐ शं शनैश्चराय नम:
    - ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:
    - ॐ शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये शंयोरभिस्त्रवन्तुन:


    शनि दोष शांति के लिए बोलें यह अचूक देवी मंत्र
    हिन्दू मान्यताओं में शुक्रवार शक्ति उपासना की विशेष घड़ी है। शास्त्रों में कहा गया है कि चण्डी यानी दुर्गा की भक्ति ही कलियुग में जल्द व शुभ फल देने वाली है। देवी दुर्गा के नौ शक्ति स्वरूप यानी नवदुर्गा भी समस्त ग्रह-नक्षत्रों के साथ पूरे जगत का पालन व पोषण व नियंत्रण करने वाली मानी गई है।

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  22. शनि दोष शांति के लिए बोलें यह अचूक देवी मंत्र
    हिन्दू मान्यताओं में शुक्रवार शक्ति उपासना की विशेष घड़ी है। शास्त्रों में कहा गया है कि चण्डी यानी दुर्गा की भक्ति ही कलियुग में जल्द व शुभ फल देने वाली है। देवी दुर्गा के नौ शक्ति स्वरूप यानी नवदुर्गा भी समस्त ग्रह-नक्षत्रों के साथ पूरे जगत का पालन व पोषण व नियंत्रण करने वाली मानी गई है।
    यही कारण है कि नवग्रह पीड़ा खासतौर पर शनि दोष शांति के लिए शुक्रवार, शनिवार या नवमी तिथि को देवी दुर्गा के नीचे लिखे मंत्र का स्मरण शारीरिक, मानसिक व आर्थिक मुश्किलों से बचाने में बहुत प्रभावी माना गया है। खासतौर पर शनि साढ़े साती, ढैय्या या शनि दशा में दुर्गा ध्यान शुभ माना गया है।
    - शुक्रवार को स्नान के बाद देवी की पूजा लाल चंदन, लाल फूल, लाल अक्षत, लाल वस्त्र चढ़ाकर करें और धूप व दीप लगाकर लाल आसन पर बैठ नीचे लिखे दुर्गा गायत्री मंत्र का ध्यान कम से कम 108 बार जप माला या हाथ से गिनकर ही करें। अंत में देवी को प्रसाद लगाकर आरती करें।
    ॐ गिरिजाये विद्महे।
    शिवप्रियाय च धीमहि।
    तन्नो दुर्गा: प्रचोदयात्।।


    शनि के बुरे समय बचने का ये है अचूक उपाय...
    धर्म-ज्योतिष को मानने वाले लोग शनिदेव और शनि के प्रभावों को अच्छे से जानते हैं। यदि किसी व्यक्ति से जाने-अनजाने कोई पाप या गलत कार्य हो गया है तो शनिदेव ऐसे लोगों को निश्चित समय पर इन कर्मों का फल प्रदान करते हैं। ज्योतिष के अनुसार शनि को न्यायाधिश का पद प्राप्त है। इसी वजह से इन्हें क्रूर देवता माना जाता है। हमारे द्वारा किए गए कर्मों का फल शनिदेव साढ़ेसाती और ढैय्या के समय में प्रदान करते हैं।
    यदि किसी व्यक्ति को अत्यधिक कष्ट भोगना पड़ रहे हैं तो इन अशुभ फलों के प्रभावों को कम करने के लिए कुछ ज्योतिषीय उपाय बताए गए हैं।
    कुछ लोगों की कुंडली में शनि अशुभ स्थिति में हो तो उसे जीवनभर कई प्रकार के कष्ट उठाने पड़ते हैं। ऐसे में प्रति शनिवार यह उपाय अपनाएं-


    शनिवार को प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में उठें और नित्यकर्मों से निवृत्त होकर स्नानादि करके पवित्र हो जाएं। इसके बाद जल, दूध, तिल्ली के तेल का दीपक लेकर किसी पीपल के वृक्ष के समीप जाएं। अब पीपल पर जल और दूध अर्पित करें। इसके बाद पीपल के वृक्ष के नीचे तिल्ली के तेल के दीपक को प्रज्जवलित करें। शनिदेव प्रार्थना करें कि आपकी सभी समस्याएं दूर हो और बुरे समय से पीछा छुट जाए। इसके बाद पीपल की सात परिक्रमा करें।
    घर लौट कर एक कटोरी में तेल लें और उसमें अपना चेहरा देखकर इस तेल का दान करें। ऐसा करने पर कुछ ही समय में आपको सकारात्मक फल प्राप्त होने लगेंगे। इसके प्रभाव से आपके घर की पैसों से जुड़ी समस्त समस्याएं दूर होने लगेंगी और आर्थिक संकट से मुक्ति मिलेगी।







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  23. मातृ दोष |
    यदि कुंडली में चंद्रमा पंचम भाव का स्वामी होकर शनि, राहु, मंगल आदि क्रूर ग्रहों से युक्त या आक्रान्त हो और गुरु अकेला पंचम या नवम भाव में है तब मातृ दोष के कारण संतान सुख में कमी का अनुभव हो सकता है.
    मातृ दोष के शांति उपाय |
    यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में मातृ दोष बन रहा है तब इसकी शांति के लिए गोदान करना चाहिए या चांदी के बर्तन में गाय का दूध भरकर दान देना शुभ होगा. इन शांति उपायों के अतिरिक्त एक लाख गायत्री मंत्र का जाप करवाकर हवन कराना चाहिए तथा दशमांश तर्पण करना चाहिए और ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए, वस्त्रादि का दान अपनी सामर्थ्य अनुसार् करना चाहिए. इससे मातृ दोष की शांति होती है.
    मातृ दोष की शांति के लिए पीपल के वृक्ष की 28 हजार परिक्रमा करने से भी लाभ मिलता है.

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  24. ब्राह्मण श्राप के शांति उपाय |
    ब्राह्मण श्राप की शांति के लिए किसी मंदिर में या किसी सुपात्र ब्राह्मण को लक्ष्मी नारायण की मूर्तियों का दान करना चाहिए. व्यक्ति अपनी शक्ति अनुसार किसी कन्या का कन्यादान भी कर सकता है. बछड़े सहित गाय भी दान की जा सकती है. शैय्या दान की जा सकती है. सभी दान व्यक्ति को दक्षिणा सहित करने चाहिए. इससे शुभ फलों में वृद्धि होती है और ब्राह्मण श्राप या दोष से मुक्ति मिलती है.

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  25. पति-पत्नी की यह प्रबल इच्छा होती है कि उनके यहां उत्तम संतान का जन्म हो क्योंकि बिना बच्चे को परिवार पूरा नहीं माना जाता। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनके यहां संतान का जन्म नहीं होता। इसके कई कारण हो सकते हैं। इस समस्या के निदान के लिए चिकित्सकीय मार्गदर्शन तो आवश्यक है ही लेकिन साथ ही यदि नीचे लिखा उपाय भी किया जाए तो संतान प्राप्ति की संभावना और भी अधिक हो जाती है।
    उपाय
    बुधवार के दिन सुबह जल्दी उठकर पति-पत्नी संयुक्त रूप से बाल गणेश की पूजा करें तथा अपने घर के मुख्य द्वार पर बाल गणपति की प्रतिमा लगाएं। आते-जाते इस प्रतिमा के समक्ष नमस्कार करें। प्रति बुधवार को गणेशजी का पूजन करने के बाद नीचे लिखे मंत्र का विधि-विधान से जप करें। इस मंत्र का जप करने से संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी होती है।
    मंत्र
    संतान गणपतये नम: गर्भदोषहो नम: पुत्र पौत्राय नम:।
    जप विधि
    - प्रति बुधवार सुबह जल्दी उठकर सर्वप्रथम स्नान आदि नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ वस्त्र पहनें।
    - इसके बाद बाल गणेश की पूजा करें और उन्हें दुर्गा चढ़ाएं साथ ही लड्डूओं का भोग भी लगाएं।
    - इसके बाद पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुश के आसन पर बैठें।
    - तत्पश्चात हरे पन्ने की माला से ऊपर लिखे मंत्र का जप करें। मंत्र का प्रभाव आपको कुछ ही समय में दिखने लगेगा

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  26. 3- वास्तु शास्त्र के अनुसार विवाह योग्य युवक-युवतियों के कमरे एवं दरवाजे का रंग गुलाबी, हल्का पीला या सफेद (चमकीला) हो तो विवाह में आ रही परेशानियां दूर हो जाती हैं।

    4- यदि मंगल दोष के कारण किसी के विवाह में विलंब हो रहा है, तो उसके कमरे के दरवाजे का रंग लाल अथवा गुलाबी रखने से मंगल दोष का प्रभाव कम होता है व विवाह प्रस्ताव आने लगते हैं।

    5- यदि कोई विवाह योग्य युवक-युवती विवाह के लिए तैयार न हो, तो उसके कक्ष की उत्तर दिशा की ओर क्रिस्टल बॉल कांच की प्लेट अथवा प्याली में रखनी चाहिए। वास्तु शास्त्र के अनुसार ऐसा करने से वह विवाह के लिए मान जाता है।

    6- यदि विवाह प्रस्ताव में व्यवधान आ रहे हों तो विवाह वार्ता के लिए घर आए अतिथियों को इस प्रकार बैठाएं कि उनका मुख घर में अंदर की ओर हो और उन्हें घर का दरवाजा दिखाई न दे। ऐसा करने से बात पक्की होने की संभावना बढ़ जाती है।

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  27. यदि परिवार में किसी का विवाह नहीं हो रहा हो अथवा होने में देरी हो रही है, तो इसका कारण भी वास्तु दोष हो सकता है। यदि आप भी अपनी संतान के विवाह में हो रही देरी से परेशान हैं, तो एक बार घर के वास्तु दोषों पर जरूर विचार करें और आगे बताए गए उपाय करें-

    1- वास्तु शास्त्र के अनुसार विवाह योग्य युवक-युवती जिस पलंग पर सोते हैं, उसके नीचे लोहे की वस्तुएं या व्यर्थ का सामान नहीं रखना चाहिए। ऐसा होने से उनके विवाह योग में बाधा उत्पन्न होती है।

    2- वास्तु के नियमों के अनुसार विवाह योग्य युवक-युवतियों को उत्तर या उत्तर-पश्चिम दिशा में स्थित कमरे में रहना चाहिए। ऐसा करने से इनके लिए विवाह के प्रस्ताव आने लगते हैं।

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  28. आचार्य कहते हैं जो लोग लालची होते हैं, हमेशा पैसा-पैसा करते रहते हैं, उनके लिए सबसे बड़ा शत्रु कोई भिखारी होता है। लालची व्यक्ति कभी भी अपना धन किसी को देना नहीं चाहते हैं, ऐसे लोगों के सामने यदि कोई भिखारी या उनका धन मांगने वाला कोई अन्य व्यक्ति आ जाए तो वे उसे शत्रु की नजर से ही देखते हैं।

    यदि कोई व्यक्ति मूर्ख है तो वह ज्ञानी लोगों को अपना शत्रु मानता है। मूर्ख व्यक्ति कभी नहीं चाहता है कि कोई उसे ज्ञान का मार्ग दिखाए। अज्ञानी लोग स्वयं को ही श्रेष्ठ समझते हैं और उनके लिए दूसरे लोग अज्ञानी होते हैं। ऐसे लोग मूर्खतावश किसी का भी अपमान कर सकते हैं, अत: मूर्ख लोगों को उपदेश देने से बचना चाहिए।

    यदि कोई व्यक्ति चोर है तो वह चंद्रमा को अपना सबसे बड़ा शत्रु मानता है। चोर हमेशा अपना काम रात के अंधेरे में ही करता है और अंधेरे में चांद की रोशनी ही उसे पकड़वा सकती है। इसी वजह से चोर चंद्रमा को शत्रु मानते हैं।

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  29. पति-पत्नी का रिश्ता आपसी तालमेल पर ही निर्भर करता है। यदि तालमेल में कमी हो तो छोटी सी परेशानी भी बड़ा असर दिखा सकती है। कभी-कभी वैवाहिक जीवन में ऐसी परिस्थितियां निर्मित हो जाती हैं, जिनकी वजह से पति और पत्नी एक-दूसरे को ही शत्रु मानने लगते हैं। ऐसी परिस्थितियों के संबंध में आचार्य चाणक्य ने यह नीति बताई है...

    आचार्य चाणक्य कहते हैं कि...

    लुब्धानां याचक: शत्रु: मूर्खाणां बोधको रिपु:।

    जारस्त्रीणां पति: शत्रुश्चौराणां चंद्रमा रिपु:।।

    इस श्लोक में चाणक्य ने बताया है कि यदि कोई स्त्री बुरे चरित्र वाली है तो उसका सबसे बड़ा शत्रु उसी का पति होता है। गलत आचरण वाली स्त्री को उसका पति बुराई करने से रोकता है, इसी वजह से पत्नी अपने पति को ही सबसे बड़ा शत्रु मानती है। जब पत्नी गलत रास्ते पर चलने लग जाती है, तब पति और पत्नी का वैवाहिक जीवन खतरे में पड़ जाता है। अधिकांश परिस्थितियों में ऐसा वैवाहिक रिश्ता समाप्त ही हो जाता है। अत: पति और पत्नी, दोनों को ही गलत रास्तों से दूर रहना चाहिए।

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  30. जिन लोगों की कुंडली धनु लग्न की है और उसके सप्तम भाव में शुक्र स्थित है तो व्यक्ति को जीवन साथी की ओर से कई मतभेदों का सामना करना पड़ता है। ये लोग जीवन साथी की ओर से पूर्ण सहयोग प्राप्त नहीं कर पाते हैं और इसी वजह से इन्हें धन संबंधी मामलों में हानि होती है। शत्रु पक्ष पर इन लोगों का प्रभाव अधिक रहता है। धनु लग्न की कुंडली के सप्तम भाव मिथुन राशि का स्वामी बुध है। बुध की इस राशि में शुक्र होने पर व्यक्ति को आमदनी के क्षेत्र में विशेष परिश्रम करना पड़ता है। यह स्थान जीवन साथी और व्यवसाय से संबंधित होता है। यहां शुक्र होने पर व्यक्ति को व्यवसाय में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

    धनु लग्न की कुंडली के अष्टम भाव में शुक्र हो तो...

    कुंडली का अष्टम भाव आयु, स्वास्थ्य एवं पुरातत्व का कारक स्थान है। धनु लग्न में इस स्थान कर्क राशि का स्वामी चंद्र है। चंद्र की इस राशि में शुक्र होने पर व्यक्ति को स्वास्थ्य के संबंध में काफी शक्ति प्राप्त होती है। बाहरी स्थानों से इन लोगों को अधिक लाभ होता है। घर-परिवार के मामलों में ये लोग भाग्यशाली रहते हैं। अच्छे स्वास्थ्य के कारण ये लोग अधिक उम्र तक जीते हैं।

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  31. ऋषि स्नान और दानव स्नान

    ऋषि स्नान- यदि कोई व्यक्ति सुबह-सुबह जब आकाश में तारे दिखाई दे रहे हों और उस समय स्नान करें तो उस स्नान को ऋषि स्नान कहा जाता है।

    सामान्यत: जो स्नान सूर्योदय से पहले किया जाता है वह मानव स्नान कहलाता है। सूर्योदय से पूर्व किए जाने वाले स्नान ही श्रेष्ठ होते हैं।

    दानव स्नान- वर्तमान समय में काफी लोग सूर्योदय पश्चात और चाय-नाश्ता करने के बाद स्नान करते हैं, ऐसे स्नान को दानव स्नान कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार हमें ब्रह्म स्नान, देव स्नान या ऋषि स्नान करना चाहिए। यही सर्वश्रेष्ठ स्नान हैं।

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  32. रह्म स्नान और देव स्नान

    ब्रह्म स्नान- सुबह-सुबह ब्रह्म मुहूर्त में यानी सुबह लगभग 4-5 बजे जो स्नान भगवान का चिंतन करते हुए किया जाता है, उसे ब्रह्म स्नान कहते हैं। ऐसा स्नान करने वाले को इष्टदेव की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में दुखों का सामना नहीं करना पड़ता है।

    देव स्नान- आज के समय में अधिकांश लोग सूर्योदय के बाद ही स्नान करते हैं। जो लोग सूर्योदय के बाद किसी नदी में स्नान करते हैं या घर पर ही विभिन्न नदियों के नामों का जप करते हुए स्नान करते हैं तो उस स्नान को देव स्नान कहा जाता है। ऐसे स्नान से भी व्यक्ति के जीवन की सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं।

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  33. नदी में नहाते समय पानी पर ऊँ लिखें

    यदि कोई व्यक्ति किसी नदी में स्नान करता है तो उसे पानी पर ऊँ लिखकर पानी में तुरंत डुबकी मार लेना चाहिए। ऐसा करने से नदी स्नान का अधिक पुण्य प्राप्त होता है। इसके अलावा आपके आस-पास की नकारात्मक ऊर्जा भी समाप्त हो जाती है।

    नहाते समय करें मंत्रों का जप

    शास्त्रों के अनुसार दिन के सभी आवश्यक कार्यों के लिए अलग-अलग मंत्र बताए गए हैं। नहाते समय भी हमें मंत्र जप करना चाहिए। स्नान करते समय किसी मंत्र का पाठ किया जा सकता है या कीर्तन या भजन या भगवान का नाम लिया जा सकता है। ऐसा करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

    नहाते समय इस मंत्र का जप करना श्रेष्ठ रहता है...

    गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरी जलऽस्मिन्सन्निधिं कुरु।।

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  34. बुरी नजर दूर होती है

    धन संबंधी मामलों में कई बार हम ईमानदारी से पूरी मेहनत करते हैं, लेकिन सकारात्मक फल प्राप्त नहीं हो पाते हैं। कार्यों में असफलता की वजह से पैसों की तंगी बढऩे लगती है। ऐसे में अक्सर ख्याल आता है कि इतनी मेहनत के बाद भी हमें उचित प्रतिफल प्राप्त क्यों नहीं हो रहा है। यदि कुंडली में ग्रह दोष होते हैं तो इस प्रकार की परिस्थितियां निर्मित होती हैं। किसी व्यक्ति की बुरी नजर से भी कार्यों में हानि हो सकती है।

    यहां दिए गए उपाय से इस प्रकार की परेशानियां खत्म हो जाती हैं। ग्रह दोष भी शांत होते हैं। यदि आपके ऊपर किसी की बुरी नजर है तो वह भी उतर जाती है।

    नहाते समय यह उपाय करने से आपके आस-पास की नकारात्मक शक्तियां प्रभावहीन हो जाती हैं। आपको कार्यों में सफलता मिलने लगती है और मेहनत का सही फल प्राप्त होता है। इस उपाय के साथ ही इष्टदेवी-देवताओं का भी पूजन-अर्चन करते रहना चाहिए।

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  35. तांत्रिक उपाय की विधि

    तांत्रिक उपाय कई प्रकार के होते हैं और ये उपाय ठीक से किए जाते हैं तो व्यक्ति के घर की दशा बदल सकती है। यहां नहाते समय किया जाने वाला तांत्रिक उपाय बताया जा रहा है। इस उपाय के अनुसार जिस बाल्टी में हम नहाने का पानी लेते हैं, उस पानी पर यह उपाय करना चाहिए।

    नहाने के लिए बाल्टी को पानी से पूरा भर लें। इसके बाद अपनी तर्जनी उंगली (इंडेक्स फिंगर) से पानी पर त्रिभुज का निशान बनाएं।

    त्रिभुज बनाने के बाद एक अक्षर का बीज मंत्र ह्रीं उसी निशान के बीच वाले स्थान पर लिख दें।

    इस प्रकार प्रतिदिन नहाने से पहले यह उपाय करें। यह तांत्रिक उपाय है अत: इस संबंध में किसी प्रकार की शंका या संदेह नहीं करना चाहिए। अन्यथा उपाय का प्रभाव निष्फल हो जाता है। साथ ही, इस उपाय की चर्चा भी किसी से नहीं करना चाहिए।

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  36. हिन्दू धर्मग्रंथों के मुताबिक शनि, सूर्य पुत्र है, किंतु पिता-पुत्र होने पर भी शनि-सूर्य के बीच शत्रुभाव है। इस बात से जुड़ी पौराणिक कथा है कि शनि सूर्य की पत्नी छाया की संतान थे, किंतु शनि के जन्म के समय उनका रंग-रूप देखकर सूर्यदेव ने उनको, अपना पुत्र मानने से इंकार किया और छाया का अपमान किया।
    माता का अपमान सहन न कर पाने से शनि ने घोर तप कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और सूर्य से भी अधिक बलवान बनने का वर मांगा। भोलेनाथ ने भी शनि की इच्छा पूरी कर नवग्रहों में सबसे ऊंचा स्थान भी दिया। यही नहीं, भगवान शिव ने बुरे कर्मों के लिए जगत के हर प्राणी को दण्ड देने का अधिकार भी शनि को दिया। यही वजह है कि शनि दण्डाधिकारी या न्याय के देवता भी कहलाते हैं।

    शनि की सजा से कौन-कौन बदहाल या बर्बाद हो सकता है, इसका जवाब भी शास्त्रों में लिखा गया है। शनि के प्रभाव का किन पर होता है, इस बारे में शास्त्र लिखते हैं कि -

    देवासुरमनुष्याश्च सिद्धविद्याधरोरगा:।
    तव्या विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत:।।

    जिसका मतलब है - देवता, असुर, मनुष्य, सिद्ध, विद्याधर या विद्वान, ज्ञानी और नाग इन सभी का शनि की क्रूर दृष्टि या दण्ड से नाश हो सकता है।

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  37. हिन्दू धर्मग्रंथों के मुताबिक शनि, सूर्य पुत्र है, किंतु पिता-पुत्र होने पर भी शनि-सूर्य के बीच शत्रुभाव है। इस बात से जुड़ी पौराणिक कथा है कि शनि सूर्य की पत्नी छाया की संतान थे, किंतु शनि के जन्म के समय उनका रंग-रूप देखकर सूर्यदेव ने उनको, अपना पुत्र मानने से इंकार किया और छाया का अपमान किया।
    माता का अपमान सहन न कर पाने से शनि ने घोर तप कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और सूर्य से भी अधिक बलवान बनने का वर मांगा। भोलेनाथ ने भी शनि की इच्छा पूरी कर नवग्रहों में सबसे ऊंचा स्थान भी दिया। यही नहीं, भगवान शिव ने बुरे कर्मों के लिए जगत के हर प्राणी को दण्ड देने का अधिकार भी शनि को दिया। यही वजह है कि शनि दण्डाधिकारी या न्याय के देवता भी कहलाते हैं।

    शनि की सजा से कौन-कौन बदहाल या बर्बाद हो सकता है, इसका जवाब भी शास्त्रों में लिखा गया है। शनि के प्रभाव का किन पर होता है, इस बारे में शास्त्र लिखते हैं कि -

    देवासुरमनुष्याश्च सिद्धविद्याधरोरगा:।
    तव्या विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत:।।

    जिसका मतलब है - देवता, असुर, मनुष्य, सिद्ध, विद्याधर या विद्वान, ज्ञानी और नाग इन सभी का शनि की क्रूर दृष्टि या दण्ड से नाश हो सकता है।

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  38. हर देवता को अलग-अलग तरह के फूल-पत्र प्रिय माने गए हैं, तो कुछ विशेष फूल देवताओं को चढ़ाना निषेध भी होता है। किंतु शास्त्रों में ऐसे भी फूल बताए गए हैं, जिनको चढ़ाने से हर देवशक्ति की कृपा मिलती है या यूं कहें कि ये फूल हर देवी-देवता की पूजा में शुभ होते हैं और तमाम सुख-सौभाग्य बरसाते हैं। अगली स्लाइड्स पर तस्वीरों के जरिए जानिए ऐसे खूबसूरत व किस्मत बनाने वाले खास फूल-पत्ते, जो किसी भी देवी-देवता को चढ़ाए जा सकते हैं-

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  39. जीवन में सत्य से बड़ा कोई व्रत नहीं है। जिसने सत्य को जीवन में उतार लिया, वो संसार में सभी परेशानियों से जीत सकता है।

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  40. 1.खुद की कमाई से कम खर्च हो ऐसी जिन्दगी बनाओ..!
    2. दिन मेँ कम से कम 3 लोगो की प्रशंशा करो..!
    3. खुद की भुल स्वीकार ने मेँ कभी भी संकोच मत करो..!
    4. किसी के सपनो पर हँसो मत..!
    5. आपके पीछे खडे व्यक्ति को भी कभी कभी आगे जाने का मौका दो..!
    6. रोज हो सके तो सुरज को उगता हुए देखे..!
    7. खुब जरुरी हो तभी कोई चीज उधार लो..!
    8. किसी के पास से कुछ जानना हो तो विवेक से दो बार पुछो..!
    9. कर्ज और शत्रु को कभी बडा मत होने दो..!
    10. ईश्वर पर पुरा भरोशा रखो..!
    11. प्रार्थना करना कभीमत भुलो, प्रार्थना मेँ अपार शक्ति होती है..!
    12. अपने काम से मतलब रखो..!
    13. समय सबसे ज्यादा किमती है, इसको फालतु कामो मेँ खर्च मत करो..!
    14. जो आपके पास है, उसी मेँ खुश रहना सिखो..!
    15. बुराई कभी भी किसी कि भी मत करो करो,
    क्योकिँ बुराई नाव मेँ छेद समान है, बुराई छोटी हो बडी नाव तो डुबोही देती है..!
    16. हमेशा सकारात्मक सोच रखो..!
    17. हर व्यक्ति एक हुनर लेकर पैदा होता बस उस हुनर को दुनिया के सामने लाओ..!
    18. कोई काम छोटा नही होता हर काम बडा होता है जैसे कि सोचो जो काम आप कर रहे हो अगर आप वह काम आप नही करते हो तो दुनिया पर क्या
    असर होता..?
    19." सफलता उनको ही मिलती है जो कुछकरते है
    20. कुछ पाने के लिए कुछ खोना नही
    बल्कि कुछ करना पडता है

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  41. जिन लोगों की कुंडली धनु लग्न की है और उसके सप्तम भाव में शुक्र स्थित है तो व्यक्ति को जीवन साथी की ओर से कई मतभेदों का सामना करना पड़ता है। ये लोग जीवन साथी की ओर से पूर्ण सहयोग प्राप्त नहीं कर पाते हैं और इसी वजह से इन्हें धन संबंधी मामलों में हानि होती है। शत्रु पक्ष पर इन लोगों का प्रभाव अधिक रहता है। धनु लग्न की कुंडली के सप्तम भाव मिथुन राशि का स्वामी बुध है। बुध की इस राशि में शुक्र होने पर व्यक्ति को आमदनी के क्षेत्र में विशेष परिश्रम करना पड़ता है। यह स्थान जीवन साथी और व्यवसाय से संबंधित होता है। यहां शुक्र होने पर व्यक्ति को व्यवसाय में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

    धनु लग्न की कुंडली के अष्टम भाव में शुक्र हो तो...

    कुंडली का अष्टम भाव आयु, स्वास्थ्य एवं पुरातत्व का कारक स्थान है। धनु लग्न में इस स्थान कर्क राशि का स्वामी चंद्र है। चंद्र की इस राशि में शुक्र होने पर व्यक्ति को स्वास्थ्य के संबंध में काफी शक्ति प्राप्त होती है। बाहरी स्थानों से इन लोगों को अधिक लाभ होता है। घर-परिवार के मामलों में ये लोग भाग्यशाली रहते हैं। अच्छे स्वास्थ्य के कारण ये लोग अधिक उम्र तक जीते हैं।

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  42. हिन्दू धर्मग्रंथों के मुताबिक शनि, सूर्य पुत्र है, किंतु पिता-पुत्र होने पर भी शनि-सूर्य के बीच शत्रुभाव है। इस बात से जुड़ी पौराणिक कथा है कि शनि सूर्य की पत्नी छाया की संतान थे, किंतु शनि के जन्म के समय उनका रंग-रूप देखकर सूर्यदेव ने उनको, अपना पुत्र मानने से इंकार किया और छाया का अपमान किया।
    माता का अपमान सहन न कर पाने से शनि ने घोर तप कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और सूर्य से भी अधिक बलवान बनने का वर मांगा। भोलेनाथ ने भी शनि की इच्छा पूरी कर नवग्रहों में सबसे ऊंचा स्थान भी दिया। यही नहीं, भगवान शिव ने बुरे कर्मों के लिए जगत के हर प्राणी को दण्ड देने का अधिकार भी शनि को दिया। यही वजह है कि शनि दण्डाधिकारी या न्याय के देवता भी कहलाते हैं।

    शनि की सजा से कौन-कौन बदहाल या बर्बाद हो सकता है, इसका जवाब भी शास्त्रों में लिखा गया है। शनि के प्रभाव का किन पर होता है, इस बारे में शास्त्र लिखते हैं कि -

    देवासुरमनुष्याश्च सिद्धविद्याधरोरगा:।
    तव्या विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत:।।

    जिसका मतलब है - देवता, असुर, मनुष्य, सिद्ध, विद्याधर या विद्वान, ज्ञानी और नाग इन सभी का शनि की क्रूर दृष्टि या दण्ड से नाश हो सकता है।

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  43. हिन्दू धर्मग्रंथों के मुताबिक शनि, सूर्य पुत्र है, किंतु पिता-पुत्र होने पर भी शनि-सूर्य के बीच शत्रुभाव है। इस बात से जुड़ी पौराणिक कथा है कि शनि सूर्य की पत्नी छाया की संतान थे, किंतु शनि के जन्म के समय उनका रंग-रूप देखकर सूर्यदेव ने उनको, अपना पुत्र मानने से इंकार किया और छाया का अपमान किया।
    माता का अपमान सहन न कर पाने से शनि ने घोर तप कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और सूर्य से भी अधिक बलवान बनने का वर मांगा। भोलेनाथ ने भी शनि की इच्छा पूरी कर नवग्रहों में सबसे ऊंचा स्थान भी दिया। यही नहीं, भगवान शिव ने बुरे कर्मों के लिए जगत के हर प्राणी को दण्ड देने का अधिकार भी शनि को दिया। यही वजह है कि शनि दण्डाधिकारी या न्याय के देवता भी कहलाते हैं।

    शनि की सजा से कौन-कौन बदहाल या बर्बाद हो सकता है, इसका जवाब भी शास्त्रों में लिखा गया है। शनि के प्रभाव का किन पर होता है, इस बारे में शास्त्र लिखते हैं कि -

    देवासुरमनुष्याश्च सिद्धविद्याधरोरगा:।
    तव्या विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत:।।

    जिसका मतलब है - देवता, असुर, मनुष्य, सिद्ध, विद्याधर या विद्वान, ज्ञानी और नाग इन सभी का शनि की क्रूर दृष्टि या दण्ड से नाश हो सकता है।

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  44. नव रत्नों के गुण एवं पहचान में रत्नों का प्रभाव सर्वमान्य व महत्वपूर्ण हैं। जितना महत्वपूर्ण कुंडली के आधार पर रत्नों का चुनाव हो उतना ही महत्वपूर्ण रत्न खरीदते समय उसकी गुणवत्ता तथा रंग, आकृति आदि का ध्यान रखना है। अंततः रत्न की गुणवत्ता प्रयोगशाला में जानी जा सकती है। परंतु कुछ मूलभूत पहचान निम्न तरीकों से भी की जा सकती है। इसके सामान्य गुण व पहचान की विधि विस्तृत रूप से दी गयी है। माणिक्य माणिक्य को सूर्य ग्रह का रत्न कहा जाता है। यह लाल रंग का होता है। 24 रत्ती से अधिक का हो तो लाल कहलाता है। यह एक मूल्यवान रत्न हैं। यह षडभुजीय पद्धति के अंतर्गत आता है। कबूतर के रक्त के रंग का माणिक्य श्रेष्ठ समझा जाता है। माणिक्य के गुण श्रेष्ठ और उत्तम माणिक्य के निम्नलिखित गुण होते हैं। जिस माणिक्य को प्रातः काल सूर्य के सामने रखते ही उसमें से लाल रंग की किरणें चारों तरफ बिखरने लगें वह माणिक्य उत्तम गुण का माना जाता है। अगर माणिक्य को पत्थर पर घिसने पर वह न घिसे और उसका वजन न घटे और उसकी शोभा और बढ़ जाए तो उसे शुद्ध समझना चाहिए। अंधकार में रखने पर यदि वह सूर्य की आभा के समान चमकता हो तो वह श्रेष्ठ माणिक्य होगा। सौगुने दूध में माणिक्य को डालने से दूध लाल दिखाई दे अथवा लाल किरणंे निकलने लगें तो वह उच्च कोटि का माणिक्य होता है। प्रातः काल सूर्य के सामने दर्पण पर माणिक्य को रखें। यदि दर्पण के नीचे की तरफ छाया भाग में किरणें दिखाई दें तो समझें कि वह उत्तम माणिक्य है। श्रेष्ठ माणिक्य लाल कमल की पंखुड़ियों के समान लाल, निर्मल, सुंदर, गोल, समान अंग-अवयव वाला और दीप्तिमान होता है। माणिक्य के दोष अगर माणिक्य में निम्नलिखित दोष पाए जाएं तो बिल्कुल नहीं पहनना चाहिए। सुन्न माणिक्य अथवा बिना खनक वाला अर्थात जिस माणिक्य के जमीन पर गिरने से आवाज न आए।

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  45. दोरंगा अर्थात एक ही नग में दो रंग हों तो उसे त्याग देना चाहिए। अगर उसमें किसी भी तरह का जाला आदि हो तो समझें कि वह दोषपूर्ण है। अगर उसमें किसी प्रकार का कोई बिंदु, चीरा या गड्ढा हो अथवा वह धमू ्रवर्ण हा े ता े इस े दाष्े ापणर््ू ा मान।ंे अगर रत्न में चुरचुरापन, पारदर्शिता की कमी, रंग में मलिनता, शहद के रंग का छींटा आदि हों तो वह दोषपूर्ण होता है। माणिक्य की पहचान श्रेष्ठ और सच्चे माणिक्य की पहचान निम्नलिखित है। श्रेष्ठ माणिक्य को आंखों पर रखने से ठंडक मालूम होती है। अगर रत्न में बुलबुले दें या रत्न हल्का हो तो कंाच को बनावटी समझना चाहिए। अगर कोई चीर या चरेड़ अथवा लकीर दिखाई दे, तो देखना आवश्यक है कि य े सब दाष्े ा शीश े के हंै या माणिक्य के। यदि यह शीशा होगा तो उसके चीर में चमक होगी। रत्न के चीर, चरेड़ अथवा लकीर में चमक नहीं होती। उस चीर में अस्वाभाविकता नहीं होती बल्कि वह टेढ़ी-मेढ़ी होती है। उसकी सफाई भी नहीं होती है। कृत्रिम रत्नों में रेशा होता है। यह रूखा और सफेद होता है। अगर इमीटेशन के रबड़ के पैंदे का भाग नग में आ गया हो तो उसमंे सफेद कण स्पष्ट दिखाई देते हैं। यदि माणिक्य में ‘दूधक’ हो, उस दूधक में नीलिमा हो और वह चलता हुआ नहीं हो तो उसे नकली समझना चाहिए। माणिक्य की परत सीधी और नकली की परत बलयाकार होती है। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंतर है। अगर श्रेष्ठ माणिक्य को बर्फ के टुकड़े के ऊपर रख दिया जाए तो जोर की आवाज आती है। इसके विपरीत नकली होगा तो कोई आवाज नहीं आएगी। मोती मोती चंद्र ग्रह का रत्न है। इसका रंग सफेद होता है। यह खनिज नहीं। बल्कि जैविक पदार्थ है। भारत में प्राचीन मान्यता के अनुसार मोती आठ प्रकार के होते हैं- अभ्र मोती, शंख मोती, शुक्ति मोती, सर्प मोती, गज मोती, बांस मोती, शूकर मोती और मीन मोती। इन मोतियों की उत्पत्ति अलग-अलग प्रकार से होती है।

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  46. कल्चर मोती: यह एक प्रकार का ब्लिस्टर मोती होता है। एक कृत्रिम पदार्थ सीपी और मेंटल के बीच पहुंचा दिया जाता है। यह पदार्थ मोती का एक छोटा सा दाना होता है। घोंघा इसी पर परतें डालने लगता है। जैसा कि यह प्राकृतिक विजातीय पदार्थ के अंदर आने पर करता है। इस प्रकार जो मोती तैयार होता है उसे सीपी से अलग कर उस पर मुक्ता आवरण चढ़ा दिया जाता है। फिर पालिश की जाती है। पालिश करने के बाद इसे एक विशेष किस्म की पालिश की मोटी परत से ढक दिया जाता है। 24 घंटे रखा जाए तो असली मोती और ज्यादा चमकने लगता है। कल्चर मोती में काफी अंतर आ जाता है। चावल में मोती को रगड़ने से सच्चे मोती की चमक और ज्यादा बढ़ जाती है जबकि कल्चर मोतियों की चमक कम हो जाती है। मूंगा यह मंगल ग्रह का रत्न है। इसका रंग लाल सिंदूरी होता है। यह खनिज नहीं अपितु जंतु की देन है। इसकी आकर्षक आभा और रंग के कारण इसे नवरत्नों में शामिल किया गया है। इसकी उत्पत्ति वानस्पतिक मानी गई है। परंतु यह भी मोती की भांति समुद्र से ही प्राप्त होता है। देखने पर इसका आकर बेल की शाखाओं जैसा लगता है। मूंगे नाम का एक जंतु, जो गूदे या जेली के समान लसलसा होता है, समुद्र में डूबी हुई चट्टानों से चिपक जाता है। इसके बाद यह कैल्शियम कार्बोनेट के कठोर जमाव को एकत्रित करके मधुमक्खियों के समान छत्ता बना लेता है। उसके बाद वर्षों तक यह जंतु कैल्शियम कार्बोनेट को इक्ट्ठा करके मूंगे का निर्माण करता है। मूंगा अपारदर्शक होता है। अलग-अलग समुद्रों में मिलने के कारण इसके आकार, रंग-रूप, और चमक में फर्क होता है। मूंगे की जांच और परख जो मूंगा पके हुए बेल के समान होता है, वह अति श्रेष्ठ होता है। गोल, लंबा, सीधा, चिकना और अपारदर्शक मूंगा भी उत्तम होता है। गड्ढे, धब्बे, तिल या लकीरों से रहित साफ, चमकदार मूंगा उत्तम होता है। जांच और परख मोती को अच्छी तरह जांच परख कर ही ही धारण करना चाहिए। फटा हुआ बारीक रेखा युक्त और धब्बेदार मोती दोषपूर्ण होता है। अगर मोती चमकरहित हो या उसके चारों ओर गोलाकार रेखा या कोई धब्बा हो तो वह दोषपूण्र् ा होता है। अगर मोती में जाल या चीरा हो, या वह श्यामवर्ण अथवा दोरंगा, हो तो अनिष्टकारी माना जाता है। मोती की पहचान असली मोती की पहचान निम्नलिखित है। कल्चर: इसमें कांच के समान विजातीय पदार्थ की गोली होती है। जो बींधने पर सूराख सी दिखाई देती है। सूराख में समानता नहीं होती है। कल्चर का छेद बीच में चैड़ा होता है। बींधने से गोली कई बार निकल जाती है। अगर यह अंदर ही रहे तो इसे लेंस द्वारा देखा जा सकता है। कल्चर मोती में ऊपर की चमड़ी कुछ कठोर होती है जबकि असली मोती की चमड़ी में कोमलता होती है। अगर गोमूत्र या खार में कल्चर मोती और असली मोती क जिस मूंगे का रंग सिंदूर, टिंगूल अथवा सिंगरफ से मिलता-जुलता हो, उत्तम होता है। उत्तम कोटि के मूंगे को लेंस से देखने पर बिल्कुल समतल दिखाई देता है। इसके विपरीत नकली मूंगे को लेंस से देखने पर मोटे-मोटे रवे स्पष्ट दिखाई देते हैं जो ढले हुए कांच के समान होते हैं। असली मूंगे को अगर शीशे पर रगड़ा किया जाए तो किसी भी तरह की आवाज नहीं आती है। इसके विपरीत नकली मूंगे को घिसने से शीशे के समान स्पष्ट आवाज आती है। पन्ना यह बुध ग्रह का रत्न है। इसमें दोष होना अनिवार्य है क्योंकि ये अक्सर षडभुजीय प्रिज्म के रूप में पाए जाते हैं। अगर इनकी कटाई की जाए तो ये खंडित हो जाते हैं। पन्ने का गहरे मखमली और घास के रंग का पन्ना सर्वोत्तम माना जाता है। इन्हें आभूषणों में जड़ते समय अत्यंत सावधानी की आवश्यकता होती है क्योंकि ये बहुत ही भंगुर होते हैं। पन्ने की पहचान श्र े ष् ठ पन्ने की पहचान निम्नलिखित है। पन्ने की जांच इसलिए आवश्यक है कि कई बार नकली कांच को रसायनों से रंगकर पन्ने के समान बना दिया जाता है। अभ्रकी: अभ्रक के समान चमक वाला, यह पन्ना अभ्रक के साथ निकलता है। इसमें अभ्रक का कुछ अंश आ जाता है। यह स्पष्ट झलकने लगता है। गड्ढे या चीर से युक्त, दो रंगा, सुन्न, काले या पीले छींटों वाला, बुरबुरा और रुग्ण चमकहीन पन्ना नहीं धारण करना चाहिए। उत्तम पन्ना हरे रंग का, चिकना, पारदर्शक या अर्धपारदर्शक तथा उज्ज्वल किरणों वाला होता है। यह अति उत्तम कोटि का माना जाता है।

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  47. उत्तम पन्ना बिंदुरहित और पानीदार होता है। असली पन्ने को चेसस फिल्टर से देखा जाए तो वह गुलाबी रंग का दिखाई देगा जबकी नकली का रंग हरा ही रहेगा। उत्तम कोटि के पन्ने का रंग कृत्रिम प्रकाश में भी हरा ही दिखाई देता है। नकली और असली रत्न के जो दोष होते हैं वे दोष देखने से ही पता चल जाते हैं। इमीटेशन की चीर शीशे की चीर के समान होती है। अगर असली रत्न को हल्दी के साथ घिसा जाए तो हल्दी का रंग नहीं बदलेगा। इसके विपरीत नकली पन्ने को हल्दी के साथ घिसने पर हल्दी लाल हो जाएगी। नकली पन्ने में पानी के बुलबुलों जैसे हवा के छोटे-छोटे बुलबुले यंत्र से देखने पर दिखाई देंगे। इसके विपरीत असली पन्ना एकदम साफ होगा। पुखराज यह वृहस्पति ग्रह का रत्न है। शुद्ध पुखराज हल्के पीले रंग का चमकदार होता है। यह मांगलिक भी होता है। पुखराज सहज ही चिर जाता है। पुखराज के गुण और परख असली पुखराज की नीचे लिखी विशेषताएं होती हैं। आजकल बाजार में पुखराज से मिलते जुलते कई पीले रंग के नकली रत्न उपलब्ध रहते हैं। इसलिए नीचे लिखी विशेषताओं और गुणों को ध्यान में रखकर ही पुखराज लेना चाहिए। हाथ में रखने पर भारी लगता है। इसकी छवि स्निग्ध और स्वच्छ होती है, दाना बड़ा और परतरहित होता है। असली पुखराज मुलायम तथा चिकना होता है। इसका रंग कनेर के फूल के जैसा होता है। उत्तम कोटि के पुखराज को कसाटै ी पर घिसन े पर उसक े रगं आरै छवि में निखार आ जाता। जिस पुखराज के पीलेपन में कालिमा मिली हो, या जो दोरंगा हो, चमकहीन हो और बालू के समान कर्कश हो वह, नकली होता है। पुखराज रत्न के तीन रवे एक दूसरे के साथ समकोण बनाते हुए परंतु असमान कक्ष होते हैं और सामान्यतया प्रिज्म या त्रिभुज के आकार के होते हैं। उत्तम पुखराज की अपनी निराली चमक होती है। उच्च कोटि के पुखराज को रगड़कर आग उत्पन्न की जा सकती है। उत्तम पुखराज को अगर एक किनारे से कनिष्ठिका और अंगूठे से पकड़कर जोर से दबाया जाए तो यह छिटककर दूर जा गिरता है।

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  48. श्रेष्ठ पुखराज को अगर आग पर गर्म किया जाए तो वह बीच से अस्त होते सूर्य की तरह लाल हो जाता है। इसके अलावा अगर रत्न में बुलबुले हों, या जाला हो, किसी भी किस्म की चीर या हरेड़ हो, तो धारण नहीं करना चाहिए। अलग-अलग खानों से निकलने के कारण पुखराज विभिन्न रंगों के हो सकते हंै। इसलिए ज्योतिष में पुखराज को चार श्रेणियों में बांटा गया है- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। ब्राह्मण वर्ण का पुखराज सफेद होता है। रंगहीन होता है। क्षत्रिय वर्ण का पुखराज गुलाबी होता है। शूद्र वर्ण का पुखराज श्याम आभायुक्त होता है। वैश्य वर्ण का पुखराज पीले रंग का होता है। नीलम यह शनि ग्रह का रत्न है। वि.ि भन्न स्थानों से प्राप्त होने के कारण इसकी कठोरता भी भिन्न-भिन्न होती है। नीलम अर्धपारदर्शक और पारदर्शक दोनों होते हैं। नीलम की पहचान असली नीलम की पहचान निम्नलिखित हैं। नकली नीलम में रंगों की वक्र पट्टियां दिखाई देती हैं जबकि असली नीलम में रंगों की पट्टियां सीधी और षडभुजीय प्रिज्म के समान होती हंै। असली नीलम में कुछ खनिज पदार्थ रहते हैं जो स्थान भेद के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। असली नीलम चिकना, चमकदार, साफ और मोर के पंख के समान आभा वाला होता है। असली नीलम को अगर मुट्ठी में पकड़ा जाए तो गर्मी का अनुभव होता है और कई बार रक्त का दबाव बढ़ जाता है। श्रेष्ठ नीलम के पास अगर कोई तिनका लाया जाए तो वह इससे चिपक जाता है। पूर्णिमा की रात जब चंद्रमा की विमल ज्योत्सना फैली हुई हो तब गौरवर्ण की किसी सुंदर कन्या के हाथ में स्वच्छ दूध से भरा कटोरा दे दिया जाए और उस पात्र पर नीलम का प्रकाश डाला जाए। यदि नीलम अपने प्रकाश से दूध, दूध के पात्र और कन्या पर तत्काल नीली आभा छा दे तो उसे उत्तम कोटि का समझना चाहिए। गोमेद गोमेद राहु ग्रह का रत्न है। ये पारदर्शक, पारभासक और अपारदर्शक होते हैं। गोमेद की पहचान गोमेद की पहचान निम्नलिखित है। सामान्यतः गोमेद उल्लू अथवा बाज की आंख तथा गोमूत्र के रंग के समान हल्के पीले रंग का होता है। असली गोमेद को 24 घंटे तक गोमूत्र में रखने से अगर गोमूत्र का रंग बदल जाए तो रत्न असली होता है। स्वच्छ, चिकना और भारी गोमेद उत्तम होता है तथा उसमें शहद के रंग की झाईं दिखाई देती है। इस रत्न की पहचान यह भी है कि कभी-कभी स्पेक्ट्रोस्कोप यंत्र में यह शोषण पटरियां बताता है। इसकी स्पष्ट पहचान यह है कि इसमें दोहरावर्तन होता है और इस कारण पिछले किनारे सामने से देखने पर दोहरे दिखाई देते हैं। लहसुनिया लहसुनिया केतु ग्रह का रत्न है। लहसुनिया की पहचान लहसुनिया रत्न की पहचान निम्नलिखित है। उच्च कोटि के लहसुनिया रत्न को अगर हड्डी के ऊपर रख दिया जाए तो 24 घंटे के अंदर, हड्डी के आर-पार छेद हो जाता है। असली लहसुनिया में ढाई या तीन सफेद सूत होते हैं जो बीच में इधर-उधर हिलते रहते हैं। रत्न अपने चित्ताकर्षक रंग तथा चमकदार आभा के कारण हरेक आदमी का मन मोह लेते हैं। प्रकृति की देन ये रत्न संसार के प्रायः सभी देशों में पाए जाते हंै। हीरा यह शुक्र ग्रह का रत्न है। यह विभिन्न रंगों में पाया जाता है। हीरा विद्युत का कुचालक है। छः कोणों वाले हीरे के देवता इंद्र, शुक्ल वर्ण के यम, सर्प मुखाकार विष्णु, शंक्वाकार के वरुण और व्याघ्र के समान हीरे के देवता यम हैं। हीरे की पहचान असली हीरे की पहचान निम्न प्रकार से की जा सकती है। असली हीरे में प्रविष्ट हुआ प्रकाश लगभग पूरा भीतर से लौट आता है। हीरे से प्रकाश की किरण का इंद्र धनुषी रंगों का बिखराव अत्यधिक मात्रा में होता है। श्रेष्ठ हीरे की अपनी विशेष चमक-दमक होती है। ऐसी चमक अन्

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  49. किसी रत्न में नहीं होती है। काटे-संवारे हीरे के खंड की मेखला के ऊपर अथवा इसके समीप की मूल परत पर प्राकृतिक अंश भी अवश्य बचा रह जाता है।

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  50. जन्मकुंडली के द्वादश भावों में से प्रमुखतया, अष्टम भाव, नवम, सप्तम, बारहवां भाव विदेश यात्रा से संबंधित है। तृतीय भाव से भी लघु यात्राओं की जानकारी ली जाती है। अष्टम भाव समुद्री यात्रा का प्रतीक है। सप्तम तथा नवम भाव लंबी विदेश यात्राएं, विदेशों में व्यापार, व्यवसाय एवं प्रवास के द्योतक हैं। इसके अतिरिक्त लग्न तथा लग्नेश की शुभाशुभ स्थिति भी विदेश यात्रा संबंधी योगों को प्रभावित करती है। मेष लग्न 1- मेष लग्न हो तथा लग्नेश तथा सप्तमेश जन्म कुंडली के किसी भी भाव में एक साथ हों या उनमें परस्पर दृष्टि संबंध हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। 2- मेष लग्न में शनि अष्टम भाव में स्थित हो तथा द्वादशेश बलवान हो तो जातक कई बार विदेश यात्राएं करता है। 3- मेष लग्न हो व लग्नेश तथा भाग्येश अपने-अपने स्थानों में हों या उनमें स्थान परिवर्तन योग बन रहा हो तो विदेश यात्रा होती है। 4- मेष लग्न हो तथा छठे, अष्टम या द्वादश स्थान में कहीं भी शनि हो या शनि की दृष्टि इन भावों पर हो तो विदेश यात्रा का योग होता है। 5- मेष लग्न में अष्टम भाव में बैठा शनि जातक को स्थान से दूर ले जाता है तथा बार-बार विदेश यात्राएं करवाता है। उदाहरण कुंडलियों में सैफ अली खान व अभिषेक बच्चन की कुंडलियों में यही स्थिति है। वृष लग्न 1- वृष लग्न में सूर्य तथा चंद्रमा द्वादश भाव में हो तो जातक विदेश यात्रा करता है तथा विदेश में ही काम-धंधा करता है। 2- वृष लग्न हो तथा शुक्र केंद्र में हो और नवमेश नवम भाव में हो तो विदेश यात्रा का योग होता है। 3- वृष लग्न हो तथा शनि अष्टम भाव में स्थित हो तो जातक बार-बार विदेश जाता है और विदेश यात्राएं होती रहती हैं। 4- वृष लग्न हो व लग्नेश तथा नवम भाव का स्वामी, मेष, कर्क, तुला या मकर राशि में हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। 5- वृष लग्न में भाग्य स्थान या तृतीय स्थान में मंगल राहु के साथ स्थित हो तो जातक सैनिक के रूप में विदेश यात्राएं करता है। उदाहरण कुंडली में लता मंगेशकर की यही स्थिति है- 6- वृष लग्न में राहु लग्न, दशम या द्वादश में हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। लता मंगेशकर की कुंडली में राहु द्वादश भाव में स्थित है। गायन के सिलसिले में इन्होंने कई विदेश यात्राएं की हैं। मिथुन लग्न 1- मिथुन लग्न हो, मंगल व लग्नेश दसवें भाव में स्थित हो, चंद्रमा व लग्नेश शनि द्वारा दृष्ट न हांे तो ऐसे योग वाला जातक विदेश यात्रा करता है।

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  51. 2- मिथुन लग्न हो और लग्नेश तथा नवमेश का स्थान परिवर्तन योग हो तो विदेश यात्रा योग बनता है। 3- मिथुन लग्न हो, शनि वक्री होकर लग्न में बैठा हो तो कई बार विदेश यात्राएं होती हैं। 4- मिथुन लग्न हो तथा लग्नेश व द्वादशेश में परस्पर स्थान परिवर्तन हो व अष्टम व नवम भाव बलवान हो तो विदेश यात्रा होती है। यदि लग्न में राहु अथवा केतु अनुकूल स्थिति में हों और नवम भाव तथा द्वादश स्थान पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। कर्क लग्न 1- कर्क लग्न हो और लग्नेश व चतुर्थेश बारहवें भाव में स्थित हांे तो जातक विदेश यात्रा करता है। 2- कर्क लग्न में चंद्रमा नवम भाव में हो और नवमेश लग्न में स्थित हो तो विदेश यात्रा होती है। 3- यदि लग्नेश, भाग्येश और द्वादशेश कर्क, वृश्चिक व मीन राशियों में स्थित हो, तो विदेश यात्रा का योग होता है। 4- यदि लग्नेश नवम भाव में स्थित हो और चतुर्थेश छठे, आठवें या द्वादश भाव में हो तो विदेश यात्राएं होती हैं। 5- यदि लग्नेश बारहवें स्थान में हो या द्वादशेश लग्न में हो तो काफी संघर्ष के बाद विदेश यात्रा होती है। 6- कर्क लग्न में लग्नेश व द्वादशेश की किसी भी भाव में युति हो तो विदेश यात्राएं होती हैं। सिंह लग्न 1- सिंह लग्न में गुरु, चंद्र 3, 6, 8 या 12वें भाव में हो तो विदेश यात्रा के योग हैं। 2- लग्नेश जहां बैठा हो उससे द्वादश भाव में स्थित ग्रह अपनी उच्च राशि में स्थित हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। 3- सिंह लग्न में द्वादश भाव में कर्क का चंद्रमा स्थित हो तो विदेश यात्रा होती है। 4- सिंह लग्न हो तथा मंगल और चंद्रमा की युति द्वादश भाव में हो तो विदेश यात्रा होती है। 5- यदि सिंह लग्न में लग्न स्थान में सूर्य बैठा हो व नवम व द्वादश भाव शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। कन्या लग्न 1- यदि कन्या लग्न में सूर्य स्थित हो व नवम व द्वादश भाव शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो विदेश यात्रा योग बनता है। 2- यदि सूर्य अष्टम स्थान में स्थित हो तो जातक दूसरे देशों की यात्राएं करता है। 3- यदि लग्नेश, भाग्येश और द्वादशेश का परस्पर संबंध बने तो जातक को जीवन में विदेश यात्रा के कई अवसर मिलते हैं

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  52. 4- कन्या लग्न में बुध और शुक्र का स्थान परिवर्तन विदेश यात्रा का योग बनाता है। 5- द्वितीय भाव में शनि अपनी उच्च राशि में स्थित हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। तुला लग्न 1- तुला लग्न में नवमेश बुध उच्च का होकर बारहवें भाव में स्वराशि में स्थित हो, राहु से प्रभावित हो तो राहु की दशा अंतर्दशा में विदेश यात्रा होती है। 2- यदि चतुर्थेश व नवमेश का परस्पर संबंध हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। 3- यदि नवमेश या दशमेश का परस्पर संबंध या युति या परस्पर दृष्टि संबंध हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। 4- चतुर्थ स्थान में मंगल व दशम स्थान में गुरु उच्च का होकर स्थित हो। 5- यदि लग्न में शुक्र व सप्तम में चंद्रमा हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। उदाहरण कुंडली में टेनिस स्टार सानिया मिर्जा की यही स्थिति है। वृश्चिक लग्न 1- वृश्चिक लग्न में पंचम भाव में अकेला बुध हो और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो शीघ्र ही विदेश यात्रा होती है। 2- वृश्चिक लग्न में चंद्रमा लग्न में हो, मंगल नवम स्थान में स्थित हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। 3- यदि सप्तमेश शुभ ग्रहों से दृष्ट होकर द्वादश स्थान में स्थित हो तो जातक विवाह के बाद विदेश यात्रा करता है। 4- यदि वृश्चिक लग्न में शुक्र अष्टम स्थान में हो या नवम स्थान में गुरु चंद्रमा की युति हो तो विदेश यात्रा का योग होता है। 5- वृश्चिक लग्न में लग्नेश सप्तम भाव में स्थित हो व शुभ ग्रहों से युक्त हो या दृष्टि संबंध हो तो कई बार विदेश यात्रा होती है

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  53. 5- यदि लग्न में शुक्र व सप्तम में चंद्रमा हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। उदाहरण कुंडली में टेनिस स्टार सानिया मिर्जा की यही स्थिति है। वृश्चिक लग्न 1- वृश्चिक लग्न में पंचम भाव में अकेला बुध हो और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो शीघ्र ही विदेश यात्रा होती है। 2- वृश्चिक लग्न में चंद्रमा लग्न में हो, मंगल नवम स्थान में स्थित हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। 3- यदि सप्तमेश शुभ ग्रहों से दृष्ट होकर द्वादश स्थान में स्थित हो तो जातक विवाह के बाद विदेश यात्रा करता है। 4- यदि वृश्चिक लग्न में शुक्र अष्टम स्थान में हो या नवम स्थान में गुरु चंद्रमा की युति हो तो विदेश यात्रा का योग होता है। 5- वृश्चिक लग्न में लग्नेश सप्तम भाव में स्थित हो व शुभ ग्रहों से युक्त हो या दृष्टि संबंध हो तो कई बार विदेश यात्रा होती है व जातक विदेश में ही बस जाता है। धनु लग्न 1- धनु लग्न में अष्टम स्थान में कर्क राशि का चंद्रमा हो तो जातक कई बाद विदेश यात्रा करता है। 2- धनु लग्न में द्वादश स्थान में मंगल, शनि आदि पाप ग्रह बैठे हों तो विदेश यात्रा का योग बनता है। 3- धनु लग्न में नवमेश नवम भाव में स्थित हो, बलवान हो व चतुर्थेश से दृष्टि संबंध बनाता हो, युत हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। 4- अष्टम भाव में चंद्रमा, गुरु की युति, नवमेश नवम भाव में हो तो विदेश यात्रा का प्रबल योग बनता है। 5- धनु लग्न में बुध और शुक्र की महादशा अक्सर विदेश यात्रा करवाती है। मकर लग्न 1- मकर लग्न में सप्तमेश, अष्टमेश, नवमेश या द्वादशेश के साथ राहु या

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  54. केतु की युति हो जाए तो विदेश गमन होता है। 2- मकर लग्न हो, चतुर्थ और दशम भाव में चर राशि हो और इनमें से किसी भी स्थान में शनि स्थित हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। 3- लाभेश और अष्टमेश की युति एकादश स्थान में हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। 4- नवमेश बलवान हो तो विदेश यात्रा होती है। 5- शनि चंद्रमा की युति किसी भी स्थान में हो या दोनों में दृष्टि संबंध हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। 6- सूर्य अष्टम में स्थित हो तो विदेश यात्राएं होती हैं। उदाहरण कुंडली में मदर टैरेसा की यही स्थिति है- कुंभ लग्न 1- कुंभ लग्न में नवमेश व लग्नेश का राशि परिवर्तन विदेश यात्रा कराता है। 2- भाग्येश द्वादश भाव में उच्च का होकर स्थित हो तो विदेश यात्रा होती है। 3- दशम स्थान में सूर्य व मंगल की युति विदेश यात्रा का योग बनाता है। 4- नवम या द्वादश या लग्न या नवम के स्वामियों का स्थान परिवर्तन विदेश यात्रा करवाता है। 5- कुंभ लग्न में तृतीय स्थान, नवम स्थान व द्वादश स्थान का परस्पर संबंध विदेश यात्रा का योग करवाता है। मीन लग्न 1- लग्नेश गुरु नवम भाव में स्थित हो व चतुर्थेश बुध छठे, आठवें या द्वादश भाव में स्थित हो तो जातक कई बाद विदेश गमन करता है। 2- पंचमेश, द्वितीयेश व नवमेश की लाभ (एकादश) भाव में युति विदेश यात्रा का योग बनाता है। 3- द्वादश भाव में मंगल, शनि आदि पाप ग्रह हों तो विदेश यात्रा का योग बनता है।

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  55. 4- यदि शुक्र चंद्रमा से छठे, आठवें या बारहवें स्थान में स्थित हो तो विदेश गमन योग बनता है। 5- मीन लग्न में लग्नेश नवम भाव में स्थित हो व चतुर्थेश छठे, आठवें या द्वादश भाव में हो तो विदेश यात्रा का प्रबल योग बनता है। 6- लग्नस्थ चंद्रमा व दशम भाव में शुक्र हो तो जातक कई देशों की यात्रा करता है। उदाहरण कुंडली में बाबा रामदेव की यही स्थिति है-

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  56. कुंडली का पांचवां भाव विद्या एवं बुद्धि का कारक स्थान है, सिंह लग्न में इस भाव धनु राशि का स्वामी गुरु है। गुरु की इस राशि में बुध ग्रह हो तो व्यक्ति को विद्या एवं बुद्धि के क्षेत्र में काफी उपलब्धियां प्राप्त होती हैं। बुध की इस स्थिति के कारण ये लोग घर-परिवार का सुख प्राप्त करते हैं।
    सिंह लग्न की कुंडली के षष्ठम भाव में बुध हो तो...
    जिन लोगों की कुंडली सिंह लग्न की है और उसके षष्ठम भाव में बुध स्थित है तो उन लोगों को धन के मामलों में कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कुंडली का षष्ठम भाव शत्रु एवं रोग का कारक स्थान है। सिंह लग्न में छठे भाव मकर राशि का स्वामी शनि है। शनि की इस राशि में बुध हो तो व्यक्ति शत्रुओं पर धन की मदद से विजय प्राप्त करता है। ये लोग बोलचाल में विनम्र होते हैं।

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  57. हिन्दूग्रंथ रामचरितमानस के मुताबिक जब शिव भक्ति के घमण्ड में चूर काकभुशुण्डि गुरु का उपहास करने पर भगवान शंकर के शाप से अजगर बने। तब गुरु ने ही अपने शिष्य को शाप से मुक्त कराने के लिए शिव की स्तुति में रुद्राष्टक की रचना की। गुरु के तप व शिव भक्ति के प्रभाव से यह शिव स्तुति बड़ी ही शुभ व मंगलकारी शक्तियों से सराबोर मानी जाती है। साथ ही मन से सारी परेशानियों की वजह अहंकार को दूर कर विनम्र बनाती है।

    शिव की इस स्तुति से भी भक्त का मन भक्ति के भाव और आनंद में इस तरह उतर जाता है कि हर रोज व्यावहारिक जीवन में मिली नकारात्मक ऊर्जा, तनाव, द्वेष, ईर्ष्या और अहं को दूर कर देता है, इसलिए किसी भी दिन रुद्राष्टक का पाठ धर्म और व्यवहार के नजरिए से शुभ फल ही देता है।

    यह स्तुति सरल, सरस और भक्तिमय होने से शिव व शिव भक्तों को बहुत प्रिय भी है। धार्मिक नजरिए से शिव पूजन के बाद इस स्तुति के पाठ से शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं। अगली तस्वीर पर क्लिक कर जानिए यह शिव स्तुति-

    नमामीशमीशान निर्वाण रूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम्‌ ।
    अजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाश माकाशवासं भजेऽहम्‌ ॥

    निराकार मोंकार मूलं तुरीयं, गिराज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्‌ ।
    करालं महाकाल कालं कृपालुं, गुणागार संसार पारं नतोऽहम्‌ ॥

    तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं, मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम्‌ ।
    स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारू गंगा, लसद्भाल बालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥

    चलत्कुण्डलं शुभ्र नेत्रं विशालं, प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालुम्‌ ।
    मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं, प्रिय शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥

    प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं, अखण्डं अजं भानु कोटि प्रकाशम्‌ ।
    त्रय:शूल निर्मूलनं शूलपाणिं, भजे अहं भवानीपतिं भाव गम्यम्॥

    कलातीत-कल्याण-कल्पांतकारी, सदा सज्जनानन्द दातापुरारी।
    चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी, प्रसीद-प्रसीद प्रभो मन्माथारी॥

    न यावद् उमानाथ पादारविन्दं, भजंतीह लोके परे वा नाराणम्।
    न तावत्सुखं शांति संताप नाशं, प्रसीद प्रभो सर्वभुताधिवासम् ॥

    न जानामि योगं जपं नैव पूजा, न तोऽहम्‌ सदा सर्वदा शम्भू तुभ्यम्‌ ।
    जरा जन्म दु:खौद्य तातप्यमानं, प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ॥

    रूद्राष्टक इदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये,
    ये पठंति नरा भक्त्या तेषां शम्भु प्रसीदति ॥

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  58. हर इंसान के मन में धनी बनने और धन से तमाम सुख-सुविधाओं को पाने का भाव आता है। इनको पूरा करने के लिए वह तरह-तरह के काम और धार्मिक उपाय चुनता है।

    ऐसे ही उपायों में शिव की विशेष मंत्र स्तुति से शिवरात्रि पर शिव पूजा दु:ख, दरिद्रता और धन के अभाव को दूर कर धन, संतान व अच्छी सेहत के जरिए वैभवशाली और संपन्न बना देती है। जानिए यह शिव मंत्र स्तुति, जो दारिद्रयदहन शिवस्तोत्रम्‌ के नाम से भी जानी जाती है। शिवलिंग को जल, दूध, बिल्वपत्र और सफेद आंकड़ा समर्पित कर इस मंत्र स्तुति का पाठ करें -

    विश्वेश्वराय नरकार्णवतारणाय
    कर्णामृताय शशिशेखरधारणाय।
    कर्पूरकांतिधवलाय जटाधराय
    दारिद्रयदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥1॥

    गौरीप्रियाय रजनीशकलाधराय
    कालान्तकाय भुजगाधिपकङ्कणाय।
    गङ्गाधराय गजराजविमर्दनाय ॥2॥

    भक्तिप्रियाय भवरोगभयापहाय
    उग्राय दुर्गभवसागरतारणाय।
    ज्योतिर्मयाय गुणनामसुनृत्यकाय ॥3॥

    चर्माम्बराय शवभस्मविलेपनाय
    भालेक्षणाय मणिकुण्डलमण्डिताय।
    मञ्जीरपादयुगलाय जटाधराय ॥4॥

    पञ्चाननाय फणिराजविभूषणाय
    हेमांशुकाय भुवनत्रयमण्डिताय।
    आनंतभूमिवरदाय तमोमयाय ॥5॥

    भानुप्रियाय भवसागरतारणाय
    कालान्तकाय कमलासनपूजिताय।
    नेत्रत्रयाय शुभलक्षणलक्षिताय ॥6॥

    रामप्रियाय रघुनाथवरप्रदाय
    नागप्रियाय नरकार्णवतारणाय।
    पुण्येषु पुण्यभरिताय सुरार्चिताय ॥7॥

    मुक्तेश्वराय फलदाय गणेश्वराय
    गीतप्रियाय वृषभेश्वरवाहनाय।
    मातङग्‌चर्मवसनाय महेश्वराय ॥8॥

    वसिष्ठेन कृतं स्तोत्रं सर्वरोगनिवारणम्‌।
    सर्वसम्पत्करं शीघ्रं पुत्रपौत्रादिवर्धनम्‌।
    त्रिसंध्यं यः पठेन्नित्यं स हि स्वर्गमवाप्नुयात्‌ ॥9॥

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  59. शिव उपासना की इस मंगलकारी घड़ी में कल्याणकारी देवता शिव के अद्भुत षड़ाक्षरी मंत्र स्तुति का स्मरण तमाम सफलता व सुख पाने के लिए असरदार माना गया है। जिसे शिव की पंचोपचार पूजा कर बोलना भी शुभ फलदायी माना गया है।

    ॐकार बिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायंति योगिन:।
    कामदं मोक्षदं चैव ऊँकाराय नमो नम:।।

    नमंति ऋषयो देवा नमन्त्यप्सरसां गणा:।
    नरा नमंति देवेशं नकाराय नमो नम:।।

    महादेव महात्मानं महाध्यानं परायणम्।
    महापापहरं देव मकाराय नमो नम:।।

    शिवं शातं जगन्ननाथं लोकानुग्रहकारकम्।
    शिवमेकपदं नित्यं शिकाराय नमो नम:।।

    वाहनं वृषभो यस्य वासुकि: कंठभूषणम्।
    वामे शक्तिधरं वेदं वकाराय नमो नम:।।

    यत्र तत्र स्थितो देव: सर्वव्यापी महेश्वर:।
    यो गुरु: सर्वदेवानां यकाराय नमो नम:।।

    षडक्षरमिदं स्तोत्रं य: पठेच्छिवसंनिधौ।
    शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते।।

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  60. शिव पंचाक्षर स्तोत्र सारे रोग, शोक, संताप का नाश कर जीवन में शांति, सुख और समृद्धि लाने वाला माना गया है। शिव पंचाक्षर स्तोत्र शिव के अद्भुत रूप और शक्ति की स्तुति है, जो पंचाक्षर मंत्र नम: शिवाय के पांच अक्षरों न, म, श, व, य में छुपी शिव शक्ति का भी आवाहन है। भगवान शिव का यह स्तोत्र पाठ नियमित रूप से पंचोपचार पूजा कर भी जरूर करें -

    नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांगरागाय महेश्वराय|
    नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मै "न" काराय नमः शिवायः॥
    मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय|
    मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मै "म" काराय नमः शिवायः॥
    शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय|
    श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय तस्मै "शि" काराय नमः शिवायः॥
    वषिष्ठ कुंभोद्भव गौतमार्य मुनींद्र देवार्चित शेखराय|
    चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय तस्मै "व" काराय नमः शिवायः॥
    यज्ञस्वरूपाय जटाधराय पिनाकस्ताय सनातनाय|
    दिव्याय देवाय दिगंबराय तस्मै "य" काराय नमः शिवायः॥
    पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेत शिव सन्निधौ|
    शिवलोकं वाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

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  61. धर्म परंपराओं में लिंग पूजा बाणलिंग, पार्थिव लिंग सहित कई रूपों में की जाती है। शास्त्रों में कई रूपों में शिवलिंग पूजा सभी सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति करने वाली मानी गई है, जो शिवलिंग पर मात्र जल और बिल्वपत्र चढ़ाने मात्र से भी पूरी हो जाती हैं।

    महाशिवरात्रि भी शिव पूजा की बड़ी ही शुभ घड़ी है। इसलिए इस दिन शाम को शिव उपासना में शिव लिंगाष्टक का पाठ बहुत ही शुभ फल देने वाला होता है। इसे कामना सिद्धि के साथ भाग्य या संतान बाधा दूर करने वाला भी माना गया है। जानिए शिव की महिमा का यह अद्भुत पाठ –

    ब्रह्ममुरारिसुरार्चित लिगं निर्मलभाषितशोभित लिंग।
    जन्मजदुःखविनाशक लिंग तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥1॥

    देवमुनिप्रवरार्चित लिंगं, कामदहं करुणाकर लिंगं।
    रावणदर्पविनाशन लिंगं तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥2॥

    सर्वसुगंन्धिसुलेपित लिंगं, बुद्धिविवर्धनकारण लिंगं।
    सिद्धसुरासुरवन्दित लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥3॥

    कनकमहामणिभूषित लिंगं, फणिपतिवेष्टितशोभित लिंगं।
    दक्षसुयज्ञविनाशन लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥4॥

    कुंकुमचंदनलेपित लिंगं, पंकजहारसुशोभित लिंगं।
    संञ्चितपापविनाशिन लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥5॥

    देवगणार्चितसेवित लिंग, भवैर्भक्तिभिरेवच लिंगं।
    दिनकरकोटिप्रभाकर लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥6॥

    अष्टदलोपरिवेष्टित लिंगं, सर्वसमुद्भवकारण लिंगं।
    अष्टदरिद्रविनाशित लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥7॥

    सुरगुरूसुरवरपूजित लिंगं, सुरवनपुष्पसदार्चित लिंगं।
    परात्परं परमात्मक लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥8॥

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  62. शिव ही सारे सांसारिक सुखों का आधार हैं। क्योंकि शिव के इस स्वरूप व उपासना के बताए कई तरीके सरल ही नहीं बल्कि आसानी से तन, मन व धन कामनाओं को पूरा करने वाले हैं।

    इसी कड़ी में हिन्दू धर्मग्रंथों के ऐसे 5 शिव मंत्र स्तोत्र बताए जा रहे हैं, जिनका महाशिवरात्रि के दिन किसी भी पल खासतौर पर रात के वक्त स्मरण करना भी पैसा, संतान, सौभाग्य, अन्न व सेहत की सारी इच्छाएं पूरी करने वाला माना गया है। जानिए सरल शिव पूजा उपाय के साथ ये 5 शिव मंत्र स्तोत्र -

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  63. शिव ही सारे सांसारिक सुखों का आधार हैं। क्योंकि शिव के इस स्वरूप व उपासना के बताए कई तरीके सरल ही नहीं बल्कि आसानी से तन, मन व धन कामनाओं को पूरा करने वाले हैं।

    इसी कड़ी में हिन्दू धर्मग्रंथों के ऐसे 5 शिव मंत्र स्तोत्र बताए जा रहे हैं, जिनका महाशिवरात्रि के दिन किसी भी पल खासतौर पर रात के वक्त स्मरण करना भी पैसा, संतान, सौभाग्य, अन्न व सेहत की सारी इच्छाएं पूरी करने वाला माना गया है। जानिए सरल शिव पूजा उपाय के साथ ये 5 शिव मंत्र स्तोत्र -

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  64. फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार यह रात्रि भगवान शिव को अति प्रिय है। धर्म शास्त्रों के अनुसार शिवरात्रि के महत्व का वर्णन स्वयं भगवान शिव ने माता पार्वती को बताया था। उसके अनुसार भगवान शिव अभिषेक, वस्त्र, धूप तथा पुष्प से इतने प्रसन्न नहीं होते जितने कि शिवरात्रि के दिन व्रत उपवास रखने से होते हैं-
    फाल्गुने कृष्णपक्षस्य या तिथि: स्याच्चतुर्दशी।
    तस्यां या तामसी रात्रि: सोच्यते शिवरात्रिका।।
    तत्रोपवासं कुर्वाण: प्रसादयति मां ध्रुवम्।
    न स्नानेन न वस्त्रेण न धूपेन न चार्चया।
    तुष्यामि न तथा पुष्पैर्यथा तत्रोपवासत:।।

    ईशानसंहिता में बताया गया है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रिको आदिदेव भगवान श्रीशिव करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाले लिंगरूप में प्रकट हुए-
    फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवी महानिशि।
    शिललिंगतयोद्भ