Friday, January 24, 2014

Santoshi Bhajan - Karti Hoon Tumhara Vrat Mein (HD)

182 comments:

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  4. हर इंसान के स्वभाव व व्यवहार में गुण या दोष होते हैं, किंतु जो इंसान अपने दोषों को नजरअंदाज कर दूसरों की कमियां ढूंढने की कवायद में लगा रहता है, वह अक्सर कलह, संताप, आरोप-प्रत्यारोप के जाल में जीवन को उलझाकर कुंठा या निराशा का शिकार होता है। यही वजह है कि रोजमर्रा की ज़िंदगी में उठते-बैठते अक्सर किसी भी रूप में कभी अपनी खामियां दूसरों का जीवन, तो कभी दूसरों की कमियां हमारी ज़िंदगी पर बुरा असर डालती हैं। ऐसी स्थितियां किसी भी इंसान को विवेकहीन बनाती हैं, यानी सही-गलत की समझ से दूर कर सकती हैं। जीवन को ऐसी नकारात्मक दशा से बचाने या बाहर आने के लिए धर्मग्रंथों में लिखी सीधी और साफ बातों पर गौर करें तो पल में जीवन की सारी मुश्किलों का हल मिल सकता है। इसी कड़ी में हिंदू धर्मग्रंथ गरुड़ पुराण में भी मृत्यु ही नहीं, जीवन से भी जुड़े ज्ञान व रहस्यों में सफलता व तरक्की के कई सूत्र व परेशानियों के समाधान भी मिलते हैं। गरुड़ पुराण में लिखा है कि- सद्भिरासीत सततं सद्भि: कुर्वीत संगतिम्। सद्भिर्विवाद मैत्रीं च नासद्भि: किंचिदाचरेत्।। पण्डितैश्च विनीतैश्च धर्मज्ञै: सत्यवादिभि:। बन्धनस्थोपि तिष्ठेच्च न तु राज्ये खलै: सह।। इस श्लोक में व्यावहारिक जीवन को साधने व तरक्की के लिए 5 बेहतरीन सूत्र उजागर किए गए हैं, जो इंसान के हर भ्रम व संशय को दूर कर देते हैं। ये हैं- - हमेशा सज्जनों यानी गुणी, ज्ञानी, दक्ष व सरल स्वभाव के इंसानों की संगति में रहें, क्योंकि ऐसी संगति से आप ऊर्जावान बने रहकर दिशाहीन होने से बचेंगे। - दोस्ती व विवाद भी करें तो सज्जनों से, क्योंकि उनसे वाद-विवाद के दौरान भी ज्ञान की बातों से कई हल सामने आते हैं।

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  5. पंडित यानी दक्ष, विनम्र, धर्म में आस्थावान, मन, वचन व कर्म से सच्चे इंसान हों, तो उनके साथ बंधन में भी रहना गलत नहीं होगा, क्योंकि ऐसा संग यश, लक्ष्मी व सफलता लाने वाला होता है।

    - दुर्जन यानी कुटिल, व्यसनी दुर्गुणी व बुरे स्वभाव के व्यक्ति के साथ न मित्रता करें न शत्रुता, क्योंकि उसके अनुचित या अनैतिक काम मित्र हों या शत्रु, दोनों के लिए कई तरह से जीवन में अशांति, कलह या संकट की वजह बन जाते हैं।

    - दुष्ट स्वभाव के व्यक्ति के साथ शाही व आलीशान जीवन भी मिले, तो वैसे व्यक्ति का साथ छोड़ देना चाहिए, क्योंकि आखिरकार वे अपयश व दु:ख का कारण बनते हैं।

    इसी कड़ी में हिंदू धर्मग्रंथ गरुड़ पुराण में भी व्यावहारिक जीवन में बुरे कर्मोंं की सजा प्रेत योनि मिलना भी बताया गया है। इसके पीछे मकसद यही है कि हर प्राणी सदाचार, संस्कार, मर्यादा व सद्कर्मों से जुड़कर रहे तो सुख-सम्मान भरा जीवन संभव है, अन्यथा उसकी भूत-प्रेत की तरह दुर्गति होना तय है।

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  6. दरअसल, गरुड़ पुराण जीवन को साधने की ही सीख देता है, ताकि मृत्यु के बाद कष्टों का सामना न करना पड़े। अन्यथा बीमारियों से तन की कमजोरी या अपवित्रता से लेकर अज्ञानता, बुरे बोल और बर्ताव से मिलने वाले गलत नतीजे, भारी दु:ख व अभाव भी शास्त्रों में बताई मृत्यु के बाद बुरे कामों से मिलने वाली सजा भुगतने या प्रेत योनि मिलने का जीते-जी एहसास ही है। जानिए, गरुड़ पुराण के मुताबिक क्या काम करने से मिलती है प्रेत योनि-

    मातरं भगिनीं ये च विष्णुस्मरणवर्जिता:।
    अदृष्दोषां त्यजति स प्रेतो जायते ध्रुवम्।
    भ्रातृधुग्ब्रह्महा गोघ्र: सुरापो गुरुतल्पग:।
    हेमक्षौमहरस्ताक्ष्र्य स वै प्रेतत्वमाप्रुयात्।।
    न्यासापहर्ता मित्रधु्रक् परदारतस्तथा।
    विश्वासघाती क्रूरस्तु स प्रेतो जायते ध्रुवम्।।
    कुलमार्गांश्चसंत्यज्य परधर्मतस्तथा।
    विद्यावृत्तविहीनश्च स प्रेतो जायते ध्रुवम्।।

    सरल शब्दों में जानिए इन बातों में उजागर दैनिक जीवन में किए ऐसे बुरे काम, जिनसे कोई व्यक्ति मरने पर प्रेत योनि में जाता है–

    - बेकसूर मां, बहन, पत्नी, बहू और कन्या को छोड़ देना।

    - गुरुपत्नी के प्रति दुर्भाव रखने वाला, भाई के साथ दगाबाजी करने वाला , गाय को मारने वाला, नशा करने वाला, किसी भी मनुष्य या ब्राह्मण को मृत्यु तुल्य दु:ख देने वाला व चोर।

    - परायी स्त्री से संबंध रखने वाला, घर में रखी अमानत को हरने वाला, मित्र के साथ धोखा करने वाला, विश्वासघाती व दुष्ट।

    - वह अज्ञानी व दुराचरण करने वाला, जो कुटुंब या परिवार की अच्छी परंपराओं व धर्म की राह छोड़े।

    सनातन धर्म में धर्म की रक्षा या पालन के लिए अहिंसा को भी अहम माना गया है। अहिंसा सत्य व प्रेम को कायम रख धर्म के जरिए जीवन के सारे मकसदों को पाना आसान बना देती है। इसी कड़ी में जानिए हिंसा से बचें व गरुड़ पुराण के मुताबिक किन पशु-पक्षियों को मारने का पाप उतारने के लिए क्या-क्या करना पड़ता है।

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  7. शास्त्रों में अहिंसा की भावना इंसानी जीवन के लिए ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षी, पेड़-पौधों से लेकर हर जीव के लिए अहम मानी गई है। यह माना गया है कि हर जीव में ही शिव के रूप में ईश्वर का वास है। इसीलिए खासकर इंसान के लिए जीव हिंसा, यहां तक कि पेड़-पौधों को काटना भी अपराध ही माना गया है। इन जीवों में गाय, बकरे या बिल्ली जैसे पालतू पशुओं को जाने-अनजाने मारना पाप और देव अपराध माना गया है।

    जानिए गरुड़ पुराण में जाने-अनजाने गाय सहित अन्य पशु-पक्षियों को सताने या मारने या फिर पेड़-पौधों के नुकसान के प्रायश्चित के लिए भी क्या जरूरी उपाय बताए हैं-

    गोहत्या- हिंदू धर्म में गाय को देव प्राणी माना गया है। इसमें त्रिदेव से लेकर करोड़ों देवी-देवताओं का वास माना जाता है। इसलिए गोहत्या महापाप बताया गया है। गाय को मारने का पाप उतारने के लिए गाय के हत्यारे को एक माह तक पञ्चगव्य (गोमूत्र, गोबर, गाय का दूध, दही व घी की नियत मात्रा) का सेवन कर गोशाला में गायों की देखभाल करते हुए रहना पड़ता है। साथ ही, गाय का दान करना पड़ता है।

    इसके अलावा एक माह तक चन्द्रायण व्रत (चंद्रमा की तिथियों के घटने-बढ़ने के मुताबिक नियत संख्या में भोजन की मात्रा ग्रहण करना) व दूध पीकर ही पूरी तरह से पाप शुद्धि होती है।

    पेड़-पौधे- गाय या पशु ही नहीं पेड़, बेल या झाड़ी को काटने पर भी पाप से छुटकारे के लिए एक सौ बार गायत्री मंत्र का जप करना चाहिए।

    अन्य पशु-पक्षी- जाने-अनजाने तोता मारने पर 2 साल का बछड़ा दान करना पड़ता है।

    - बकरा, भेड़ या गधे को मारने पर एक बैल का दान करना पड़ता है।

    - हाथी को मारने पर 5 नील बैलों (खास प्रजाति के बैल) का दान करना पड़ता है।

    - बिल्ली, मेढक, नेवले या किसी पालतू जानवर को मारने पर व्यक्ति को तीन रात दूध पीना चाहिए। इसके अलावा, पाद कृच्छ्रव्रत (इस व्रत में एक दिन सुबह, एक दिन शाम, एक दिन मांगा हुआ भोजन करना और एक दिन उपवास किया जाता है) का पालन करना पड़ता है।

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  8. सरकारी नौकरी किस को मिल सकती है :-
    १. यदि १० भाव में मंगल हो, या १० भाव पर मंगल की दृष्टी हो,
    २. यदि मंगल ८ वे भाव के अतिरिक्त कही पर भी उच्च राशी मकर (१०) का होतो।
    ३. मंगल केंद्र १, ४, ७, १०, या त्रिकोण ५, ९ में हो तो.
    ४. यदि लग्न से १० वे भाव में सूर्य (मेष) , या गुरू (४) उच्च राशी का हो तो। अथवा स्व राशी या मित्र राशी के हो।
    ५. लग्नेश (१) भाव के स्वामी की लग्न पर दृष्टी हो।
    ६. लग्नेश (१) +दशमेश (१०) की युति हो।
    ७. दशमेश (१०) केंद्र १, ४, ७, ७ , १० या त्रिकोण ५, ९ वे भाव में हो तो। उपरोक्त योग होने पर जातक को सरकारी नौकरी मिलती है। जितने ज्यादा योग होगे , उतना बड़ा पद प्राप्त होगा।

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  9. र्म ग्रंथों के अनुसार सामुद्रिक शास्त्र की रचना शिव पुत्र कार्तिकेय ने की है। इस ग्रंथ के अनुसार आज हम आपको कुछ ऐसे लक्षणों के बारे में बता रहे हैं, जिसे देखकर सौभाग्यशाली स्त्रियों के विषय में विचार किया जा सकता है-

    रक्ता व्यक्ता गभीरा च स्निग्धा पूर्णा च वर्तुला ।1।
    कररेखांनाया: स्याच्छुभा भाग्यानुसारत ।2।

    अंगुल्यश्च सुपर्वाणो दीर्घा वृत्ता: शुभा: कृशा।

    अर्थात्- जिस स्त्री के हाथ की रेखा लाल, स्पष्ट, गहरी, चिकनी, पूर्ण और गोलाकार हो तो वह स्त्री भाग्यशाली होती है। वह अपने जीवन में अनेक सुख भोगती है।

    जिन स्त्रियों की अंगुलियां लंबी, गोल, सुंदर और पतली हो तो वह शुभफल प्रदान करती हैं।

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  10. पूर्णचंद्रमुखी या च बालसूर्य-समप्रभा।
    विशालनेत्रा विम्बोष्ठी सा कन्या लभते सुखम् ।1।

    या च कांचनवर्णाभ रक्तपुष्परोरुहा।
    सहस्त्राणां तु नारीणां भवेत् सापि पतिव्रता ।2।

    अर्थात्- जिस कन्या का मुख चंद्रमा के समान गोल, शरीर का रंग गोरा, आंखें थोड़ी बड़ी और होंठ हल्की सी लालिमा लिए हुए हों तो वह कन्या अपने जीवन काल में सभी सुख भोगती है।

    जिस स्त्री के शरीर का रंग सोने के समान हो और हाथों का रंग कमल के समान गुलाबी हो तो वह हजारों पतिव्रताओं में प्रधान होती है।

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  11. ललनालोचने शस्ते रक्तान्ते कृष्णतारके।
    गोक्षीरवर्णविषदे सुस्निग्धे कृष्ण पक्ष्मणी ।1।

    राजहंसगतिर्वापि मत्तमातंगामिनि।
    सिंह शार्दूलमध्या च सा भवेत् सुखभागिनी ।2।

    अर्थात्- जिसके दोनों नेत्र प्रान्त (आंखों के ऊपर-नीचे की त्वचा) हल्के लाल, पुतली का रंग काला, सफेद भाग गाय के दूध के समान तथा बरौनी (भौहें) का रंग काला हो वह स्त्री सुलक्षणा होती है।

    जो स्त्री राजहंस तथा मतवाले हाथी के समान चलने वाली हो और जिसकी कमर सिंह अथवा बाघ के समान पतली हो तो वह स्त्री सुख भोगने वाली होती है।

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  12. गौरांगी वा तथा कृष्णा स्निग्धमंग मुखं तथा।
    दंता स्तनं शिरो यस्यां सा कन्या लभते सुखम् ।1।

    मृदंगी मृगनेत्रापि मृगजानु मृगोदरी।
    दासीजातापि सा कन्या राजानं पतिमाप्रुयात् ।2।

    अर्थात्- जो स्त्री गौरी अथवा सांवले रंग की हो, मुख, दांत व मस्तक स्निग्ध यानी चिकना हो तो वह भी बहुत भाग्यवान होती है और अपने कुल का नाम बढ़ाने वाली होती है।

    जिस नारी के अंग कोमल तथा नेत्र, जांघ और पेट हिरन के समान हो तो वह स्त्री दासी के गर्भ से उत्पन्न होकर भी राजा के समान पति को प्राप्त करती है।

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  13. अंभोज: मुकुलाकारमंगष्टांगुलि-सम्मुखम्।
    हस्तद्वयं मृगाक्षीणां बहुभोगाय जायते ।1।

    मृदु मध्योन्नतं रक्तं तलं पाण्योररंध्रकम्।
    प्रशस्तं शस्तरेखाढ्यमल्परेखं शुभश्रियम् ।2।

    अर्थात्- जिन महिलाओं के दोनों हाथ, अंगूठा और अंगुलियां सामने होकर कमल कलिका के समान पतली व सुंदर हों, ऐसी स्त्री सौभाग्यवती होती है।

    जिस स्त्री की हथेली कोमल, हल्की लाल, स्पष्ट, बीच का भाग उठा हुआ, अच्छी रेखाओं से युक्त होती है, वह स्त्री सौभाग्य और लक्ष्मी से युक्त होती है।

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  14. मत्स्येन सुभगा नारी स्वस्तिके वसुप्रदा।
    पद्मेन भूषते पत्नी जनयेद् भूपतिं सुतम् ।1।

    चक्रवर्तिस्त्रिया: पाणौ नद्यावर्त: प्रदक्षिण:।
    शंखातपत्रकमठा नृपमातृत्वसूचका: ।2।

    अर्थात्- जिस स्त्री की हथेली में मछली का चिह्न हो तो वह सुंदर, भाग्यशाली और स्वस्तिक का चिह्न हो तो धन देने वाली होती है। कमल का चिह्न हो तो राजपत्नी होकर भूमि का पालन करने वाला पुत्र पैदा करती है।

    जिस स्त्री की हथेली में दक्षिणावर्त मंडल का चिह्न हो ता वह चक्रवर्ती राजा की पटरानी होती है। शंख, छत्र और कछुए का चिह्न हो तो वह स्त्री राजमाता होती है।

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  15. तुलामानाकृती रेखा वणिक्पत्नित्वहेतुका ।1।
    गजवाजिवृषाकारा करे वामे मृगीदृशा ।।

    रेखा प्रसादज्राभा सूते तीर्थकरं सुतम्।
    कृषीबलस्य पत्नी स्याच्छकटेन मृगेण वा ।2।

    अर्थात्- जिन स्त्रियों के उल्टे हाथ की हथेली में तराजू, हाथी, घोड़े और बैल के चिह्न हों तो वह बनिए की स्त्री होती हैं।

    जिसके हाथ में वज्र और प्रासाद (कोठी) का चिह्न हो तो वह स्त्री तीर्थ करने वाले पुत्र को पैदा करती है। शकट और मृग का चिह्न हो तो वह किसान की स्त्री होती है।

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  16. त्रिशूलासगदाशक्ति - दुन्दुभ्याकृतिरेखया ।1।
    नितम्बिनी कीर्तिमती त्यागेन पृथिवीतले ।2।

    शुभद: सरलोअंगुष्ठो वृत्तो वृत्तनखो मृदु:।

    अर्थात्- जिस स्त्री की हथेली में त्रिशूल, तलवार, गदा, शक्ति और नगाड़े के आकार की रेखा हो तो वह दान के द्वारा कीर्ति प्राप्त करती है।

    जिन सुंदरियों के अंगूठे सीधे, गोल तथा नख गोल और कोमल हो तो शुभप्रद है।

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  17. 1- अगर आपके शरीर के दाहिने भाग में या सीधे हाथ में लगातार खुजली हो, तो समझ लेना चाहिए कि आपको धन लाभ होने वाला है।

    2- बैंक में पैसे जमा करने जाते समय अगर रास्ते में गाय आ जाए तो आपके धन संबंधित सभी काम पूरे होते हैं।

    3- यदि कोई सपने में देखे कि उस पर कानूनी मुकदमा चलाया जा रहा है, जिसमें वह निर्दोष छूट गया है, तो उसे अतुल धन संपदा की प्राप्ति होती है।

    4- यदि कोई सपने में अपने सीने को खुजाता है, तो उसे विरासत में संपत्ति मिलती है, यदि आंख खुजाता है, तो धन लाभ होता है।

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  18. 5- अगर आप धन से संबंधित किसी कार्य के लिए कहीं जा रहे हों और रास्ते में पीले वस्त्र पहने कोई सुंदर स्त्री या कन्या दिख जाए, तो इसे भी धन प्राप्ति का संकेत मानना चाहिए।

    6- किसी से लेन-देन करते समय यदि पैसा आपके हाथ से छूट जाए, तो समझना चाहिए कि धन लाभ होने वाला है।

    7- जो व्यक्ति सपने में मोती, मूंगा, हार, मुकुट आदि देखता है, उसके घर में लक्ष्मी स्थाई रूप से निवास करती है।

    8- जिसे स्वप्न में कुम्हार घड़ा बनाता हुआ दिखाई देता है, उसे बहुत धन लाभ होता है। जो व्यक्ति सपने में स्वयं को केश विहीन (गंजा) देखता है, उसे अतुल्य धन की प्राप्ति होती है।

    9- दीपावली के दिन यदि कोई किन्नर संज-संवर कर दिखाई दे, तो अवश्य ही धन लाभ होता है। ये धन लाभ अप्रत्याशित रूप से होता है।

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  19. 10- सोकर उठते ही सुबह-सुबह कोई भिखारी मांगने आ जाए, तो समझना चाहिए कि आपके द्वारा दिया गया पैसा (उधार) बिना मांगे ही मिलने वाला है। इसलिए भिखारी को अपने द्वार से कभी खाली हाथ नहीं लौटाना चाहिए।

    11- यदि कोई सपने में स्वयं को कच्छा पहनकर कपड़े में बटन लगाता देखता है, तो उसे धन के साथ मान-सम्मान भी मिलता है। यदि कोई स्वप्न में किसी को चेक लिखकर देता है, तो उसे विरासत में धन मिलता है तथा उसके व्यवसाय में भी वृद्धि होती है।

    12- गुरुवार के दिन कुंवारी कन्या पीले वस्त्रों में दिख जाए, तो इसे भी शुभ संकेत मानना चाहिए। ये भी धन लाभ होने के संकेत है।

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  20. 13- अगर आप धन से संबंधित किसी काम के लिए कहीं जाने के लिए कपड़े पहन रहे हों और उसी समय आपकी जेब से पैसे गिरें, तो यह आपके लिए धन प्राप्ति का संकेत है।

    14- यदि कोई सपने में दियासलाई जलाता है, तो उसे अनपेक्षित रूप से धन की प्राप्ति होती है। सपने में अगर किसी को धन उधार देते हैं, तो अत्यधिक धन की प्राप्ति होती है।

    15- कहीं जाते समय नेवले द्वारा रास्ता काटना या नेवले का दिखना शुभ संकेत होता है। नेवला दिखना धन लाभ का संकेत होता है। आप सोकर उठे हों और उसी समय नेवला आपको दिख जाए तो गुप्त धन मिलने की संभावना रहती है।

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  21. 16- सपने में यदि गर्दन में मोच आ जाए, तो भी धन लाभ होता है। यदि पका हुआ संतरा देखे तो शीघ्र ही अतुल धन-संपत्ति प्राप्त होती है। जो सपने में खेत में पके हुए गेहूं देखता है, वह शीघ्र ही धनवान बन जाता है।

    17- शुक्रवार के दिन कपिला गाय (केसरिया रंग की) के दर्शन होना भी बहुत शुभ माना जाता है। ऐसा हो जाए तो समझना चाहिए कहीं से अचानक धन प्राप्ति के योग बन रहे हैं।

    18- जो व्यक्ति सपने में फल-फूलों का भक्षण करता है, उसे धन लाभ होता है। जो स्वप्न में धूम्रपान करता है, उसे भी धन प्राप्ति होती है। सपने में जिसके दाहिने हाथ में सफेद रंग का सांप काट ले, उसे बहुत से धन की प्राप्ति होती है।

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  22. 19- कुत्ता यदि अचानक धरती पर अपना सिर रगड़े और यह क्रिया बार-बार करे तो उस स्थान पर गढ़ा धन होने की संभावना होती है। यदि यात्रा करते समय किसी व्यक्ति को कुत्ता अपने मुख में रोटी, पूड़ी या अन्य कोई खाद्य पदार्थ लाता दिखे, तो उस व्यक्ति को धन लाभ होता है।

    20- जो व्यक्ति सपने में मूत्र, वीर्य, विष्ठा व वमन का सेवन करता है, वह निश्चित ही महा धनी हो जाता है। यदि कोई व्यक्ति सपने में अपनी प्रेमिका से संबंध विच्छेद कर लेता है, तो उसे विरासत में धन की प्राप्ति होती है।

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  23. 21- यदि कोई यात्री घर को लौट रहा हो और गधा उसके बांई ओर रेंके तो उसे थोड़े समय बाद धन लाभ होता है। यदि किसी व्यक्ति को किसी गांव, नगर अथवा मकान में प्रवेश करते समय सुअर अपनी दाहिनी ओर दिख जाए तो उसे लाभ मिलता है।

    22- जिसे सपने में ऊंट दिखाई देता है, उसे अपार धन लाभ होता है। स्वप्न में हरी फुलवारी तथा अनार देखने वाले को भी धन प्राप्ति के योग बनते हैं। सपने में यदि गड़ा हुआ धन दिखाई दे, तो उसके धन में अतुलनीय वृद्धि होती है।

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  24. घर में रखें गणेश जी की ऐसी प्रतिमा

    गणेश जी यूं तो हर रुप में मंगलकारी हैं। लेकिन धन और सुख में बाधा को दूर करने के लिए नृत्य करती हुई गणेश जी की प्रतिमा घर में रखना बहुत ही शुभ होता है।

    गणेश जी की ऐसी प्रतिमा को इस प्रकार रखना चाहिए कि घर के मुख्य द्वार पर गणेश की जी दृष्टि रहे। प्रतिमा नहीं होने पर तस्वीर भी लगा सकते हैं।

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  25. घर में रखें ऐसी बांसुरी

    बांसुरी को वास्तु दोष दूर करने में बहुत ही कारगर माना गया है। आर्थिक समस्याओं से मुक्ति के लिए व्यक्ति को चांदी की बांसुरी घर में रखना चाहिए। आप चाहें तो सोने की बांसुरी भी रख सकते हैं।

    वास्तुशास्त्र में कहा गया है कि सोने की बांसुरी घर में रखने से घर में लक्ष्मी का वास बना रहता है। अगर सोने अथवा चांदी का बांसुरी रखना संभव नहीं हो तो बांस से बनी बांसुरी घर में रख सकते हैं।

    इससे भी वास्तु दोष दूर होता है और धन आगमन के स्रोत बनने लगते हैं। शिक्षा, व्यवसाय या नौकरी में बाधा आने पर शयन कक्ष के दरवाजे पर दो बांसुरियों को लगाना शुभ फलदायी होता है।

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  26. पूजा घर में उत्तर की ओर रखें इन्हें

    देवी लक्ष्मी की तस्वीर या मूर्ति आपके घर में जरुर होगी लेकिन धन में वृद्घि के लिए लक्ष्मी के साथ घर में कुबेर की मूर्ति या तस्वीर जरुर होनी चाहिए।

    क्योंकि लक्ष्मी धन का सुख देती हैं लेकिन आय के बिना धन का सुख संभव नहीं है। आय कुबेर महाराज प्रदान करते हैं। इसलिए दोनों एक दूसरे के पूरक माने जाते हैं। कुबेर महाराज उत्तर दिशा के स्वामी हैं इसलिए इन्हें हमेशा उत्तर दिशा में ही रखें।
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  27. घर में रखें यह शंख लक्ष्मी की कृपा बनी रहेगी

    वास्तु विज्ञान के अनुसार शंख में वास्तु दोष दूर करने की अद्भुत क्षमता है। जहां नियमित शंख का घोष होता वहां के आस-पास की हवा भी शुद्घ और सकारात्मक हो जाती है।

    शास्त्रों में कहा गया है जिन घरों में देवी लक्ष्मी के हाथों में शोभा पाने वाला दक्षिणवर्ती शंख होता है वहां लक्ष्मी स्वयं निवास करती हैं। ऐसे घर में धन संबंधी परेशानी कभी नहीं आती है।

    इस शंख को लाल कपड़े में लपेटकर पूजा स्थान में रखना चाहिए और नियमित इसकी पूजा करनी चाहिए।

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  28. धन वृद्घि करता है यह नारियल

    नारियल को श्रीफल कहा गया है। श्री का अर्थ होता है लक्ष्मी इसलिए नारियल को देवी लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। इनमें एकाक्षी नारियल बहुत ही शुभ होता है।

    जिस घर में इसकी नियमित पूजा होती है वहां नकारात्मक शक्तियां नहीं ठहरती हैं। घर में दिनानुदिन उन्नति होती रहती है। लोग खुशहाल रहते हैं।

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  29. धन वृद्घि करता है यह नारियल

    नारियल को श्रीफल कहा गया है। श्री का अर्थ होता है लक्ष्मी इसलिए नारियल को देवी लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। इनमें एकाक्षी नारियल बहुत ही शुभ होता है।

    जिस घर में इसकी नियमित पूजा होती है वहां नकारात्मक शक्तियां नहीं ठहरती हैं। घर में दिनानुदिन उन्नति होती रहती है। लोग खुशहाल रहते हैं।

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  30. गंगा दशहरा

    ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है. इस दिन पवित्र नदी गंगा जी भागीरथ द्वारा स्वर्ग लोग से पृ्थ्वी लोक पर अवतीर्ण हुई थी. इस दिन स्नान, दान, तर्पण से जीवन के समस्त पापों का नाश होता है.यही कारण है, कि इस पर्व का नाम दशहरा पडा है. पर्वों की श्रेणी में गंगा दशहरा श्रद्वा और विश्वास का पर्व है. प्राचीन पुराण के अनुसार इस तिथि में स्नान, दान करना विशेष कल्याणकारी रहता है. सभी नदियों में गंगा नदी को सबसे अधिक पवित्र और पापमोचिनी माना गया है. गंगा में डूबकी लगाने से मनुष्यों को मुक्ति प्राप्त होती है.

    ऋषि भागीरथ ने अपनी कई वर्षो की कठोर तपस्या कर गंगा को पृ्थ्वी पर आने के लिये मनाया था. गंगा दशहरा पर्व पर प्यासे राहगीरों को शर्बल पिलाकर उनकी प्यास बुझाना कल्याणकारी माना जाता है. इस दिन भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बडे-बडे मेलों का आयोजन किया जाता है. जगह-जगह पर प्याऊ लगाने के साथ साथ इस दिन छतरी, वस्त्र, जूते और गर्मी की ताप से बचने के सभी साधनों को दान में देना शुभ माना जाता है. यह सभी कार्य करने से व्यक्ति के पाप दूर होते है. और वह सदमार्ग की ओर अग्रसर होता है.

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  31. निर्जला एकादशी की कथा

    निर्जला एकादशी से संबंधित एक कथा काफी प्रचलित है। यह कथा महाभारत की है। कथा के अनुसार एक बार जब महर्षि वेदव्यास पांडवों को चारों पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाली एकादशी व्रत का संकल्प करा रहे थे। तब महाबली भीम ने उनसे कहा- पितामाह, आपने प्रति पक्ष (एक माह में दो पक्ष होते हैं। शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। यानी एक माह में दो एकादशी आती हैं।) एक दिन के उपवास की बात कही है। मैं एक दिन तो क्या, एक समय भी बिना भोजन नहीं रह सकता।

    भीम ने आगे कहा कि मेरे पेट में वृक नाम की जो अग्नि है, उसे शांत रखने के लिए मुझे दिन में कई बार भोजन करना पड़ता है। क्या अपनी भूख के कारण मैं एकादशी जैसे पुण्यव्रत से वंचित रह जाऊंगा?

    भीम के इस प्रश्न के उत्तर में महर्षि ने कहा कि भीम, पूरे वर्ष में सिर्फ एक एकादशी ऐसी है जो वर्षभर की चौबीस एकादशियों का पुण्य दिला सकती है। वह एकादशी है ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी। जो भी व्यक्ति इस एकादशी का व्रत करता है उसे एक ही व्रत से सभी एकादशियों के बराबर पुण्य प्राप्त हो जाता है। अत: भीम तुम इस एकादशी का व्रत करो। भीम निर्जला एकादशी का व्रत करने के लिए सहमत हो गए। इसलिए इसे पांडव एकादशी या भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है।

    आज भी जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत करता है, उसे अक्षय पुण्य प्राप्त होते हैं और सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।

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  32. निर्जला एकादशी का व्रत किस प्रकार किया जाना चाहिए यह विधि इस प्रकार है...

    इस एकादशी पर जलपान करना वर्जित किया गया है। अत: इस दिन पानी भी नहीं पीना चाहिए। हालांकि, आज के दौर में ऐसा कर पाना काफी मुश्किल है, अत: जब प्यास असहनीय हो जाए तब दूध पान किया जा सकता है। थोड़ा बहुत फलाहार भी किया जा सकता है। वैसे इस दिन निर्जल और निराहार रहने पर अधिक पुण्य प्राप्त होता है।

    इस एकादशी पर निर्जल रहकर उपवास करना होता है, इसी वजह से इस एकादशी का नाम निर्जला एकादशी पड़ा है। यह व्रत अत्यंत कठिन और सभी इच्छाओं को पूरा करने वाला माना गया है।

    इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठना चाहिए। इसके बाद नित्यकर्मों से निवृत्त होकर भगवान विष्णु की पंचोपचार से पूजा करें। इसके पश्चात मन को शांत रखते हुए दिव्य मंत्र 'ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप करें। शाम को भगवान की पूजा करें व रात में भजन-कीर्तन करते हुए धरती पर विश्राम करें।

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  33. निर्जला एकादशी के दूसरे दिन किसी योग्य ब्राह्मण को अपने घर आमंत्रित करें और उसे भोजन कराएं। इसके बाद जल से भरे कलश के ऊपर सफेद वस्त्र ढंकें और उस पर शक्कर व दक्षिणा रखें। अब इस कलश का दान ब्राह्मण को कर दें। साथ ही, यथाशक्ति अन्न, वस्त्र, आसन, जूता, छतरी, पंखा तथा फल आदि का दान करना चाहिए। अंत में स्वयं भोजन करें।

    जल कलश का दान- धर्म ग्रंथों के अनुसार इस दिन विधिपूर्वक जल कलश का दान करने वालों को वर्ष भर की एकादशियों का फल प्राप्त होता है। हम वर्ष की 23 एकादशियों में फलाहार और अन्न खाते हैं, इससे दोष उत्पन्न होता है। अत: निर्जला एकादशी का व्रत करने से अन्य 23 एकादशियों पर अन्न खाने का दोष दूर हो जाता है। इस प्रकार निर्जला एकादशी का व्रत करने वाला सभी पापों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है।

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  34. एक अन्य कथा के अनुसार एक बार महर्षि व्यास पांडवों के आवास पर पधारे। जब महाबली भीम ने महर्षि से कहा कि युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव, माता कुन्ती और द्रौपदी सभी वर्षभर की एकादशियों का व्रत रखते हैं और मुझे भी व्रत रखने के प्रेरित करते हैं, लेकिन मैं बिना खाना खाए नहीं रह सकता हूं।

    महर्षि व्यास जानते थे कि भीम के उदर में वृक नामक अग्नि है इसलिए वह अधिक मात्रा में भोजन करता है। इसी अग्नि के कारण भीम बिना खाना खाए नहीं रह सकता है। तब महर्षि ने भीम को कहा कि तुम ज्येष्ठ शुक्ल निर्जला एकादशी का व्रत करो।

    निर्जला एकादशी व्रत में थोड़ा सा पानी पीने से दोष नहीं लगता है। इस व्रत से अन्य 23 एकादशियो का पुण्य भी प्राप्त हो जाता है। भीम ने साहस के साथ निर्जला एकादशी व्रत किया। परिणामस्वरूप निर्जला एकादशी के अगले दिन सुबह के समय भीम बेहाल हो गए। तब पांडवों ने गंगाजल, तुलसी, चरणामृत प्रसाद, देकर भीम की मुर्छा दूर की। इसलिए इस एकादशी को भीमसेन एकादशी भी कहते कहा जाता है।

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  35. हर व्यक्ति चाहता है कि उसे समाज में मान-सम्मान मिले। लेकिन कई लोगों के जीवन में कुछ ऐसे हालात बन जाते हैं कि उन्हें बार-बार बदनामी का सामना करना पड़ता है। वास्तु गुरु कुलदीप सालूजा कहते हैं कि इसका एक कारण उनका घर और उसका वास्तु होता है।

    1. जिस जमीन पर आपका घर है उसकी उत्तर दिशा और ईशान कोण ऊंचे हों और अन्य दिशा नीचे हों तो भूमि के स्वामी को बदनामी का सामना करना पड़ता है।

    2. जिस घर के आग्नेय कोण में बहुत ज्यादा मात्रा में खाद्य पदार्थ रखे जाते हैं। किसी भी रुप में अधिक मात्रा में पानी का जमाव हो जैसे वॉटर टैंक, अंडरग्राउंड वॉटर टैंक तो उस घर में रहने वाले व्यक्ति की कन्या को बदनामी का सामना करना पड़ता है।


    3. जिनके घर में दक्षिण-नैऋत्य कोण बढ़ा हुआ होता है उनके घर में स्त्रियों को बदनामी के कारण कष्ट होता है। घर का पश्चिम-नैऋत्य कोण बढ़ा हुआ हो तो पुरुषों की बदनामी होती है।

    4. घर में दक्षिण दिशा बढ़ा हुआ हो और पश्चिम नैऋत्य से मिलकर कोने का निर्माण करता है तो यह स्त्री पुरुष दोनों की बदनामी की संभावना को बढ़ाता है।

    5. घर के मुख्यद्वार की चैखट काले रंग की हो या उस पर काला रंग किया गया हो तो घर के मुखिया के साथ धोखा होता है, उस पर झूठे आरोप लगते हैं।

    6. घर के मुख्यद्वार के साथ सीधे हाथ की खिड़की के पास टूटी-फूटी हालत में दीवार हो, प्लास्टर उखड़ा हुआ हो या खिड़की टूटी हुई हो तो मरम्मत करवा लेनी चाहिए। ऐसा नहीं होने से घर के मुखिया को समाज में मानहानि का सामना करना पड़ता है।

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  36. आपने देखा होगा कि कुछ लोग अपने दरवाजे पर सरसो का तेल और सिंदूर का टीका लगा कर रखते हैं। खासतौर पर दीपावाली के दिन तो जरुर ही तेल और सिंदूर लगाते हैं। क्या आप जानते हैं इसके पीछे क्या कारण है।

    वास्तु विज्ञान के अनुसार दरवाजे पर सिंदूर और तेल लगाने से घर में नकारात्मक उर्जा का प्रवेश नहीं होता है। यह घर में मौजूद वास्तुदोष को भी दूर करने में कारगर माना जाता है।

    वास्तु विशेषज्ञ कुलदीप सालूजा के अनुसार दरवाजे पर सिंदूर लगाने से देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। जबकि सरसों का तेल शनि का प्रतिनिधि माना जाता है जो बुरी नजरों से रक्षा करता है।


    जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से दरवाजे पर तेल लगाने से दरवाजा लंबे समय तक सुरक्षित रहता है। इसलिए दरवाजे पर सिंदूर लगाने की परंपरा रही है।

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  37. घर में मकड़ी का जाला देखकर सबसे पहले आपके मन में क्या आता है। आप सोचते होंगे कि, कितना गंदा लग रहा है इसे जल्दी से जल्दी हटा दिया जाए।

    शकुन शास्त्र में और बड़े-बुर्जुगों का कहना है कि घर में मकड़ी का जाला नहीं होना चाहिए इससे नकारात्मक उर्जा का संचार होता है। इससे जीवन में कई प्रकार की उलझनें आने लगती हैं।

    लेकिन एक मान्यता यह भी है कि मकड़ी का जाला आपकी किस्मत का ताला भी खोल सकता है। लेकिन इसकी शर्त यह है कि मकड़ी के जाले में आपको अपने हस्ताक्षर या नाम की आकृति दिख जाए।



    मान्यता है कि मकड़ी के जाले में इस तरह के चिन्ह का दिखना शुभ संकेत होता है। इससे आने वाले दिनों में कोई बड़ा लाभ या अच्छी ख़बर मिलती है।

    इसलिए दीपावली के मौके पर घर की साफ-सफाई करते वक्त मकड़ी के जाले को हटाते समय एक नजर जाले की आकृति पर भी डालें। क्या पता इस दीपावली आपको कोई बड़ा फायदा मिल जाए।

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  38. गरीब आदमी के अमीर बनने में वक्त नहीं लगता

    समय हमेशा एक जैसा नहीं होता है। जैसे सुबह के बाद शाम का आना तय है उसी तरह शाम के बाद सुबह आना भी निश्चित है। ठीक इसी तरह यह जरूरी नहीं है कि जो व्यक्ति आज गरीब है वह हमेशा गरीब ही रहेगा। भाग्य के करवट बदलने की देरी है बस, गरीब आदमी के अमीर बनने में वक्त नहीं लगता है।
    भाग्य के करवट लेने पर अगर बहुत बड़े धन्ना सेठ नहीं बने तो भी आर्थिक समस्याओं से राहत तो मिल ही जाती है। इस विषय में कुछ पुरानी मान्यताएं हैं। जो पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों तक पहुंचता रहा है। ऐसे ही कुछ संकेत यहां हम बता रहे हैं जिनसे आप समझ सकते हैं कि भाग्य करवट लेने वाला है।

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  39. राह में मिल जाए ऐसी वस्तु

    राह चलते हुए कुछ चीजों का मिलना बड़ा ही सौभाग्यशाली होता है। इनमें शंख, स्वास्तिक चिन्ह, घोड़े की नाल एवं सिक्का शामिल है। कागज का रूपया इसमें शामिल नहीं है। इन चीजों को आदर सहित उठाकर प्रणाम करना चाहिए।
    घर के आंगन या बगीचे में गड्ढ़ा खोदकर गाड़ देना चाहिए। अगर ऐसा नहीं कर सकें तो पूजा घर में रख दें। इससे भाग्य उन्नत होता है और लाभ के अवसर बार-बार मिलने लगते हैं।

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  40. डरें नहीं आने वाली है खुशी

    अगर आप सांप देखते ही डर के मारे कांपने लगते हैं तो इस डर को मन से निकाल दीजिए। पौराणिक मान्यता के अनुसार सांप उस स्थान पर दिखने लगते हैं जहां धन आने वाला होता है या जिस जमीन में पहले से खूब धन होता है।
    अगर आपके घर के आंगन में नाग नागीन का जोड़ा कहीं से आ जाए तो यह अच्छा शगुन होता है। ऐसे में नाग को मारने की बजाय नाग-नागिन एवं भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए।

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  41. क्या ऐसे पहन लिए कपड़े?

    कई बार हम लोग किसी और ख्याल में होते हैं। ऐसे में करना कुछ और होता है, कर कुछ और लेते हैं। अगर आपके साथ भी ऐसा कुछ होता है और आप गलती से उल्टा कपड़ा पहन लेते हैं तो लोगों के सामने शर्माने की जरूरत नहीं है। यह संकेत है कि आपको जल्दी ही कहीं से कोई अच्छी खबर या धन का लाभ होने वाला है।
    कुछ स्थानों पर उल्टा कपड़ा पहन लेने पर ऐसा भी माना जाता है कि स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं आने वाली हैं। इसलिए सेहत के मामले में लापरवाही से बचने की कोशिश करें। स्वास्थ्य अच्छा रहेगा तभी धन और वैभव का आनंद ले सकेंगे।

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  42. छी छी कैसा सपना देख लिया

    कभी-कभी सपना भी बताता है कि, भाग्य करवट लेने वाला है। ऐसा ही एक सपना है कि आप खुद को मल में लेटे हुए अथवा मल छूते हुए देखें। यह सपना देखकर आप नाक भौंह सिकोड़ सकते हैं। लेकिन यह सपना बड़े ही भाग्य से आता है।
    यह बताता है कि सुख के दिन आने वाले हैं। कहीं से खूब लाभ मिलेगा। वैसे सुखद सपने ही लाभ के संकेत देते हैं। ऐसा ही एक सपना है गहनों से लदी कन्या का हाथ में फूल लिए नजर आना।

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  43. ज्योतिष में शरीर के लक्षणों के देखकर व्यक्तित्व और भविष्य बताने की विधि को सामुद्रिक विद्या कहते हैं। ये ज्योतिष का अभिन्न अंग है। सामुद्रिक विद्या के अनुसार मनुष्य के सिर से लेकर पैर तक हर अंग के अपने कुछ लक्षण होते हैं, उसकी बनावट, आकार और रंग हमारे व्यक्तित्व के रहस्यों पर तो रोशनी डालते ही हैं, साथ ही भविष्य भी बताते हैं। किसी भी व्यक्ति के चेहरे को देखकर ये आसानी से बताया जा सकता है कि वो व्यवहार, आचार-विचार और कार्यक्षेत्र में कैसा है।

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  44. चेहरे का आकार बताता है...

    - गोल चेहरे वाले व्यक्ति भावुक और सबकी परवाह करने वाले धनी होते हैं।
    - चौकोर चेहरे वाले व्यक्ति आक्रामक और महत्वाकांक्षी प्रवृत्ति के होते हैं। इन्हें गुस्सा जल्दी आता है और ठंडा हो जाता है।
    - जिन लोगों का चेहरा ओवल कट वाला होता है, वे लोग हर काम को लेकर प्रैक्टिकल अर्पोच रखते हैं।
    - त्रिकोण चेहरे वाले लोग ऊजार्वान होते हैं, लेकिन काम करते समय उनमें वह स्टेमिना दिखाई नहीं देता है।

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  45. यदि चेहरे की लंबाई की तुलना में व्यक्ति का चेहरा 70 प्रतिशत तक वाइड है तो वह व्यक्ति आत्मविश्वासी है।

    - आंखों से आईब्रो के बीच की दूरी ज्यादा और आईब्रो तनी रहती है तो ऐसे व्यक्ति जल्दी घुल-मिल जाते हैं।

    - जिनकी आंखों का रंग गहरा या डार्क होता है, वे जल्दी किसी को भी आकर्षित कर लेते हैं।

    - पलकें यदि घनी हैं तो ऐसे व्यक्ति ज्यादा एनालिटिकल होते हैं। जबकि, पतली पलकों वाले व्यक्ति जल्दी में काम करना जानते हैं।

    - व्यक्ति के ऊपरी होंठ भरे हुए हों तो वह उदार होता है। पतले होंठ वाले व्यक्ति कंजूस होते हैं।

    - नाक और ऊपरी होंठ के बीच दूरी अधिक है तो सेंस ऑफ ह्यूमर कमाल का है। अन्य मजाक पसंद नहीं करते।

    - दोनों आंखों के बीच की दूरी पर निर्भर है। यदि दूरी ज्यादा है तो ऐसे लोग सहनशील होते हैं।

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  46. चेहरे पर मुस्कान लिए हुए किसी बच्चे को देखकर अकसर मुंह से निकल जाता है कि कितना क्यूट है, लेिकन क्या क्यूटनेस का कोई पैमाना होता है? जवाब है हां। हाल ही में हुए एक रिसर्च के बाद डॉक्टर्स ने तय किया है कि किस तरह के चेहरे की बनावट वाले व्यक्ति को क्यूट की कैटगरी में रखा जाएगा। चेहरे के आधार पर क्यूटनेस को परखने के लिए वैज्ञािनकों ने इस अध्ययन में 90 वयस्क लोगों को 200 चेहरे दिखाए। इनसे मिले जवाबों के आधार पर तय किया गया कि गुलाबी रंगत, भरे हुए गाल, बड़ी-बड़ी आंखें, छोटी-सी बटन की तरह नाक और छोटी सी ठुड्डी है तो वह बच्चा हो या फिर बड़ा, क्यूट कहलाएगा। ये तो हुई क्यूटनेस की बात, लेकिन व्यक्ति का चेहरा उसके पूरे व्यक्तित्व का आईना भी होता है। इससे सेहत और मन का हाल आसानी से पढ़ा जा सकता है।

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  47. माथे पर आड़ी लकीरें: ये आपके पाचन तंत्र में गड़बड़ी का संकेत हैं। रोज सुबह नींबू पानी पीना ठीक रहेगा। वहीं माथे पर पिम्पल्स होना लिवर और पेट में समस्या होने की जानकारी देता है।

    आंखों बीच लाइनें खिंचना: ये लिवर पर पड़ रहे दबाव को बताती हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं। धीरे-धीरे आईब्रो के आसपास मसाज करें।

    आंखों की नीचे काले घेरे: ये बताते हैं कि आपके खून में आयरन की कमी है। कॉफी, चाय कम, फिज़ी ड्रिंक कम पिएं। पूरी नींद नहीं लेने से भी ये दिखाई देते हैं।

    कानों में खुजली: ये आमतौर पर एलर्जी की वजह से होती है। सिरोसिस और एक्जिमा भी हो सकता है। इसलिए पर्याप्त मात्रा में विटामिन डी लें।

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  48. मुंह के आसपास झुर्रियां: बढ़ती उम्र का पता बताने वाली ये झुर्रियां अकसर स्मोकिंग की वजह से भी होती हैं। लिप बाम लगाकर इन्हें कम कर सकते हैं।

    होंठ के किनारे कटना: विटामिन बी की कमी को दर्शाता है। डाइट में होलग्रेन और हरी सब्जियां शामिल करें।

    सूखे होंठ: डिहाइड्रेशन, विटामिन बी और आयरन की कमी बताते हैं। खूब सारा पानी पिएं और पोषक आहार लें।

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  49. यदि किसी व्यक्ति की कुंडली सिंह लग्न की है और उसके नवम भाव सूर्य स्थित है तो उन लोगों भाग्य एवं धर्म के संबंध में प्रबल शक्ति प्राप्त होती है। सिंह लग्न के नवम भाव मेष राशि का स्वामी मंगल है। यह स्थान धर्म एवं भाग्य का कारक स्थान है। यहां सूर्य होने पर व्यक्ति को भाग्य का साथ मिलता है और उसे कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। इन लोगों का धर्म और ईश्वर में विश्वास होता है।

    सिंह लग्न की कुंडली के दशम भाव में सूर्य स्थित हो तो...

    जिन लोगों की कुंडली के दशम भाव में सूर्य स्थित है वे लोग पिता की ओर से कुछ वैमनस्य का सामना करते हैं। कुंडली का दसवां भाव राज्य एवं पिता का कारक स्थान है। सिंह लग्न में दशम भाव वृष राशि का स्वामी शुक्र है। शुक्र की इस राशि में सूर्य होने पर व्यक्ति सफलता एवं उन्नति के लिए लगातार प्रयास करता है।

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  50. व्यवसाय में लाभ के लिए जरूरी है कि आप जहां कारोबार कर रहे हैं वहां धन आगमन की अनुकूल स्थिति हो। यह अनुकूल स्थिति तब बनती है जब दुकान या व्यापारिक प्रतिष्ठान का वास्तु सही हो नहीं तो मेहनत और समय खर्च करने के बाद भी लाभ को लेकर निराशा जनक स्थिति बनी रहती है।



    वास्तु विज्ञान के अनुसार व्यापार में बेहतर लाभ पाने के लिए सबसे पहले तो यह करें कि व्यापारिक प्रतिष्ठान की दीवारों पर गहरे रंग नहीं लगवाएं। सफेद, क्रीम एवं दूसरे हल्के रंगों का प्रयोग सकारात्मक उर्जा का संचार करता है जो लाभ वृद्घि में सहायक होता है। दीपावली आने वाली है तो रंग-रोगन करवाते समय इन बातों का ध्यान रखिएगा।
    दूसरी बात जो गौर करने की है वह यह है कि व्यापारिक प्रतिष्ठान का दरवाजा अंदर की ओर खुले। बाहर की ओर दरवाजे का खुलना लाभ को कम करता है क्योंकि आय के साथ व्यय भी बढ़ा रहता है।
    दुकानों में उत्तर एवं पश्चिम दिशा की ओर शोकेस का निर्माण करवाना चाहिए। इससे खरीदारों की संख्या बढ़ती है। धन में वृद्घि के लिए तिजोरी का मुंह उत्तर की ओर रखें क्योंकि यह देवाताओं के कोषाध्याक्ष कुबेर की दिशा है।
    अगर आपके व्यापारिक प्रतिष्ठा में सीढ़ियां बनी हुई है तो इस बात का ध्यान रखें कि सीढ़ियों की संख्या सम नहीं होनी चाहिए।

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  51. शनि शांति के उपाय

    1) कांसे के बर्तन में सरसों का तेल भरकर तथा अपना चेहरा देखकर संकल्प लेकर पंडित को दान दें।

    2) दान देने वाले व्यक्ति घर की दहलीज के अंदर खड़े रहें और पंडित को दहलीज के बाहर खड़ा कर लहसुन, तेल, लोहा, काला वस्त्र, कंबल इत्यादि दक्षिणा सहित दान दें

    3) प्रात:काल के समय पीपल का पूजन कर तेल का दीपक लगाकर परिक्रमा करें

    4) हनुमान चालीसा तथा शनि चालीसा का नित्य पाठ करें। मंगलवार तथा शनिवार को सुंदरकांड का पाठ करें

    5) पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए वर्षभर प्रत्येक शनिवार बहते जल में पानी वाले नारियल, काले कपड़े में लोहा, काला तिल बांधकर अपने पर से उतारकर शनि महाराज से प्रार्थना कर बहा दें

    6) शनि मंत्र के जप करें या करवाएं।

    मंत्र है- 'ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम:।।'

    या

    'ॐ शं शनये नम:।।

    7) ज्योतिषी से सलाह लेकर मध्यमा अंगुली में नीलम या काले घोड़े अथवा नाव की कील की अंगूठी धारण करें। बिच्छू घास को हाथ में बांधा जा सकता है।

    8) महामृत्युंजय के जप करें या करवाएं।

    9) राजा दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ या हनुमान बाहुक का पाठ नित्य करें।

    10) विशेषकर सामाजिक कानून के खिलाफ या अन्यायपूर्ण कोई कार्य न करें।

    शनि न्याय के देवता हैं। वे अपनी दशा में जातक द्वारा किए गए कर्मों का फल देते हैं।

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  52. द्वादश भावों में राहु
    राहु प्रथम भाव में शत्रुनाशक अल्प संतति मस्तिष्क रोगी स्वार्थी सेवक प्रवृत्ति का बनाता है।
    राहु दूसरे भाव में कुटुम्ब नाशक अल्प संतति मिथ्या भाषी कृपण और शत्रु हन्ता बनाता है।
    राहु तीसरे भाव में विवेकी बलिष्ठ विद्वान और व्यवसायी बनाता है।
    राहु चौथे भाव में स्वभाव से क्रूर कम बोलने वाला असंतोषी और माता को कष्ट देने वाला होता है।
    राहु पंचम भाग्यवान कर्मठ कुलनाशक और जीवन साथी को सदा कष्ट देने वाला होता है।
    राहु छठे भाव में बलवान धैर्यवान दीर्घवान अनिष्टकारक और शत्रुहन्ता बनाता है।
    राहु सप्तम भाव में चतुर लोभी वातरोगी दुष्कर्म प्रवृत्त एकाधिक विवाह और बेशर्म बनाता है।
    राहु आठवें भाव में कठोर परिश्रमी बुद्धिमान कामी गुप्त रोगी बनाता है।
    राहु नवें भाव में सदगुणी परिश्रमी लेकिन भाग्य में अंधकार देने वाला होता है।
    राहु दसवें भाव में व्यसनी शौकीन सुन्दरियों पर आसक्त नीच कर्म करने वाला होता है।
    राहु ग्यारहवें भाव में मंदमति लाभहीन परिश्रम करने वाला अनिष्ट्कारक और सतर्क रखने वाला बनाता है।
    राहु बारहवें भाव में मंदमति विवेकहीन दुर्जनों की संगति करवाने वाला बनाता है।

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  53. इस मंत्र से होने लगी धन की बरसात

    आदि शंकराचार्य द्वारा रचित कनकधारा स्तोत्र मंत्र ऐसा सिद्घ मंत्र माना जाता है जिसके नियमित पाठ से देवी लक्ष्मी की कृपा सदैव घर में बनी रहती है। इसी मंत्र से शंकराचार्य ने सोने की बरसात करवा दी थी इसलिए इस मंत्र को कनकधारा स्तोत्र कहा जाता है। आप भी धन वृद्घि के लिए नियमित इस स्तोत्र का पाठ करें।

    अंगहरे पुलकभूषण माश्रयन्ती भृगांगनैव मुकुलाभरणं तमालम।
    अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया:।।1।।

    मुग्ध्या मुहुर्विदधती वदनै मुरारै: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।
    माला दृशोर्मधुकर विमहोत्पले या सा मै श्रियं दिशतु सागर सम्भवाया:।।2।।

    विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षमानन्द हेतु रधिकं मधुविद्विषोपि।
    ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्द्धमिन्दोवरोदर सहोदरमिन्दिराय:।।3।।

    आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दम निमेषमनंगतन्त्रम्।
    आकेकर स्थित कनी निकपक्ष्म नेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजंगरायांगनाया:।।4।।

    बाह्यन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभै या हारावलीव हरि‍नीलमयी विभाति।
    कामप्रदा भगवतो पि कटाक्षमाला कल्याण भावहतु मे कमलालयाया:।।5।।

    कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव्।
    मातु: समस्त जगतां महनीय मूर्तिभद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया:।।6।।

    प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्य भाजि: मधुमायनि मन्मथेन।
    मध्यापतेत दिह मन्थर मीक्षणार्द्ध मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया:।।7।।

    दद्याद दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम स्मिभकिंचन विहंग शिशौ विषण्ण।
    दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूरं नारायण प्रणयिनी नयनाम्बुवाह:।।8।।

    इष्टा विशिष्टमतयो पि यथा ययार्द्रदृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लभंते।
    दृष्टि: प्रहूष्टकमलोदर दीप्ति रिष्टां पुष्टि कृषीष्ट मम पुष्कर विष्टराया:।।9।।

    गीर्देवतैति गरुड़ध्वज भामिनीति शाकम्भरीति शशिशेखर वल्लभेति।
    सृष्टि स्थिति प्रलय केलिषु संस्थितायै तस्यै ‍नमस्त्रि भुवनैक गुरोस्तरूण्यै ।।10।।

    श्रुत्यै नमोस्तु शुभकर्मफल प्रसूत्यै रत्यै नमोस्तु रमणीय गुणार्णवायै।
    शक्तयै नमोस्तु शतपात्र निकेतानायै पुष्टयै नमोस्तु पुरूषोत्तम वल्लभायै।।11।।

    नमोस्तु नालीक निभाननायै नमोस्तु दुग्धौदधि जन्म भूत्यै ।
    नमोस्तु सोमामृत सोदरायै नमोस्तु नारायण वल्लभायै।।12।।

    सम्पतकराणि सकलेन्द्रिय नन्दानि साम्राज्यदान विभवानि सरोरूहाक्षि।
    त्व द्वंदनानि दुरिता हरणाद्यतानि मामेव मातर निशं कलयन्तु नान्यम्।।13।।

    यत्कटाक्षसमुपासना विधि: सेवकस्य कलार्थ सम्पद:।
    संतनोति वचनांगमानसंसत्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे।।14।।

    सरसिजनिलये सरोज हस्ते धवलमांशुकगन्धमाल्यशोभे।
    भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्।।15।।

    दग्धिस्तिमि: कनकुंभमुखा व सृष्टिस्वर्वाहिनी विमलचारू जल प्लुतांगीम।
    प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथ गृहिणी ममृताब्धिपुत्रीम्।।16।।

    कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरां गतैरपाड़ंगै:।
    अवलोकय माम किंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया : ।।17।।

    स्तुवन्ति ये स्तुतिभिर भूमिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्।
    गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते बुधभाविताया:।।18।।

    ।। इति श्री कनकधारा स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

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  54. इस मंत्र से होने लगी धन की बरसात

    आदि शंकराचार्य द्वारा रचित कनकधारा स्तोत्र मंत्र ऐसा सिद्घ मंत्र माना जाता है जिसके नियमित पाठ से देवी लक्ष्मी की कृपा सदैव घर में बनी रहती है। इसी मंत्र से शंकराचार्य ने सोने की बरसात करवा दी थी इसलिए इस मंत्र को कनकधारा स्तोत्र कहा जाता है। आप भी धन वृद्घि के लिए नियमित इस स्तोत्र का पाठ करें।

    अंगहरे पुलकभूषण माश्रयन्ती भृगांगनैव मुकुलाभरणं तमालम।
    अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया:।।1।।

    मुग्ध्या मुहुर्विदधती वदनै मुरारै: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।
    माला दृशोर्मधुकर विमहोत्पले या सा मै श्रियं दिशतु सागर सम्भवाया:।।2।।

    विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षमानन्द हेतु रधिकं मधुविद्विषोपि।
    ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्द्धमिन्दोवरोदर सहोदरमिन्दिराय:।।3।।

    आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दम निमेषमनंगतन्त्रम्।
    आकेकर स्थित कनी निकपक्ष्म नेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजंगरायांगनाया:।।4।।

    बाह्यन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभै या हारावलीव हरि‍नीलमयी विभाति।
    कामप्रदा भगवतो पि कटाक्षमाला कल्याण भावहतु मे कमलालयाया:।।5।।

    कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव्।
    मातु: समस्त जगतां महनीय मूर्तिभद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया:।।6।।

    प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्य भाजि: मधुमायनि मन्मथेन।
    मध्यापतेत दिह मन्थर मीक्षणार्द्ध मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया:।।7।।

    दद्याद दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम स्मिभकिंचन विहंग शिशौ विषण्ण।
    दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूरं नारायण प्रणयिनी नयनाम्बुवाह:।।8।।

    इष्टा विशिष्टमतयो पि यथा ययार्द्रदृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लभंते।
    दृष्टि: प्रहूष्टकमलोदर दीप्ति रिष्टां पुष्टि कृषीष्ट मम पुष्कर विष्टराया:।।9।।

    गीर्देवतैति गरुड़ध्वज भामिनीति शाकम्भरीति शशिशेखर वल्लभेति।
    सृष्टि स्थिति प्रलय केलिषु संस्थितायै तस्यै ‍नमस्त्रि भुवनैक गुरोस्तरूण्यै ।।10।।

    श्रुत्यै नमोस्तु शुभकर्मफल प्रसूत्यै रत्यै नमोस्तु रमणीय गुणार्णवायै।
    शक्तयै नमोस्तु शतपात्र निकेतानायै पुष्टयै नमोस्तु पुरूषोत्तम वल्लभायै।।11।।

    नमोस्तु नालीक निभाननायै नमोस्तु दुग्धौदधि जन्म भूत्यै ।
    नमोस्तु सोमामृत सोदरायै नमोस्तु नारायण वल्लभायै।।12।।

    सम्पतकराणि सकलेन्द्रिय नन्दानि साम्राज्यदान विभवानि सरोरूहाक्षि।
    त्व द्वंदनानि दुरिता हरणाद्यतानि मामेव मातर निशं कलयन्तु नान्यम्।।13।।

    यत्कटाक्षसमुपासना विधि: सेवकस्य कलार्थ सम्पद:।
    संतनोति वचनांगमानसंसत्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे।।14।।

    सरसिजनिलये सरोज हस्ते धवलमांशुकगन्धमाल्यशोभे।
    भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्।।15।।

    दग्धिस्तिमि: कनकुंभमुखा व सृष्टिस्वर्वाहिनी विमलचारू जल प्लुतांगीम।
    प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथ गृहिणी ममृताब्धिपुत्रीम्।।16।।

    कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरां गतैरपाड़ंगै:।
    अवलोकय माम किंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया : ।।17।।

    स्तुवन्ति ये स्तुतिभिर भूमिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्।
    गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते बुधभाविताया:।।18।।

    ।। इति श्री कनकधारा स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

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  55. राहुकाल में शुरू किए गए किसी भी शुभ कार्य में हमेशा कोई न कोई विघ्न आता है। अगर इस समय में कोई व्यापार प्रारंभ किया गया हो तो वह घाटे में आकर बंद हो जाता है। इस काल में खरीदा गया कोई भी वाहन, मकान, जेवरात अन्य कोई भी वस्तु शुभ फलकारी नही होती। अत: किसी भी शुभ कार्य को करते समय राहुकाल पर अवश्य विचार कर लेना चाहिए।
    प्रत्येक स्थान पर एवं ऋतुओं में अलग अलग समय पर सूर्योदय एवं सूर्यास्त होता हैं। अत: हर जगह पर राहुकाल का समय अलग-अलग होता हैं किंतु प्रत्येक वार पर इसके स्टैंडर्ड समय के अनुसार राहुकाल मान सकते हैं। जैसे-

    - भारतीय ज्योतिष में सोमवार को राहुकाल का स्टैंडर्ड समय सुबह 7:30 से 9 बजे तक माना गया है।

    - मंगलवार के दिन दोपहर 3 से 4:30 बजे तक राहुकाल रहता है इसलिए इस समय कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए अन्यथा उसका अशुभ फल प्राप्त होता है। इससे बचना चाहिए।

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  56. बुधवार के दिन दोपहर 12 से 1:30 बजे तक का समय राहुकाल होता है।

    - गुरुवार के दिन राहुकाल का स्टैंडर्ड समय दोपहर 1:30 से 3 बजे तक रहता है।

    - शुक्रवार के दिन सुबह 10:30 से 12 बजे तक के समय का स्वामी राहु होता है। यही शुक्रवार के दिन राहुकाल का स्टैंडर्ड समय है।

    - शनिवार के दिन सुबह 9 से 10:30 बजे तक राहुकाल होता है। इस समय में शुरु किए गए किसी भी शुभ कार्य में हमेशा कोई न कोई विघ्न अवश्य आता है।

    - रविवार के दिन राहुकाल का समय शाम 4:30 से 6 बजे तक रहता है

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  57. प्रश्न 1- पुराणों में वर्णित अश्वमेध यज्ञ क्या है?

    उत्तर- धर्म ग्रंथों में अनेक स्थान पर अश्वमेध यज्ञ का वर्णन आता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम व महाभारत के अनुसार युधिष्ठिर ने भी ये यज्ञ करवाया था। इस यज्ञ के अंतर्गत एक घोड़ा छोड़ा जाता था। ये घोड़ा जहां तक जाता था, वहां तक की भूमि यज्ञ करने वाले की मानी जाती थी। यदि कोई इसका विरोध करता था, तो उसे यज्ञ करने वाले के साथ युद्ध करना पड़ता था। ये यज्ञ वसंत या ग्रीष्म ऋतु में किया जाता था और करीब एक वर्ष इसके प्रारंभिक अनुष्ठानों की पूर्णता में लग जाता था।

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  58. प्रश्न 2- पुष्पक विमान क्या है?

    उत्तर- पुष्पक विमान का सर्वप्रथम वर्णन वाल्मीकि रामायण में मिलता है। वैदिक साहित्य में देवताओं के विमानों की चर्चा है, लेकिन दैत्यों और मनुष्यों द्वारा उपयोग किया गया पहला विमान पुष्पक ही माना जाता है। पौराणिक संदर्भों में विज्ञान की खोज करने वालों की मान्यता है कि प्राचीन भारतीय विज्ञान आधुनिक विज्ञान की तुलना में अधिक संपन्न था। इस लिहाज से इस विमान का अस्तित्व व प्रामाणिकता स्वीकारी जाती है। प्राचीन भारतीय की वैज्ञानिक क्षमता में विश्वास करने वाले मानते हैं कि यह विमान तत्कालीन विज्ञान का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण था।

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  59. प्रश्न- 3 हिंदू नव वर्ष का प्रारंभ किस दिन से और क्यों होता है ?

    उत्तर- हिंदू नव वर्ष का प्रारम्भ चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा यानी पहले दिन से माना जाता है। इस पर्व को गुड़ी पड़वा के नाम से मनाते हैं। ब्रह्मपुराण के अनुसार पितामह ब्रह्मा ने इसी दिन से सृष्टि निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया था। इसीलिए इसे सृष्टि का प्रथम दिन माना जाता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार चारों युगों में सबसे प्रथम सत्ययुग का प्रारम्भ भी इसी तिथि से हुआ था।

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  60. प्रश्न 4- जिस समय भगवान श्रीराम को वनवास दिया गया, उस समय उनकी आयु कितनी थी?

    उत्तर- वाल्मीकि रामायण के अनुसार जिस समय भगवान श्रीराम को वनवास दिया गया, उस समय उनकी आयु लगभग 27 वर्ष थी। राजा दशरथ श्रीराम को वनवास नहीं भेजना चाहते थे, लेकिन वे वचनबद्ध थे। जब श्रीराम को रोकने का कोई उपाय नहीं सूझा तो उन्होंने श्रीराम से यह भी कह दिया कि तुम मुझे बंदी बनाकर स्वयं राजा बन जाओ।

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  61. प्रश्न 5- पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य का जन्म कैसे हुआ था?

    उत्तर- गुरु द्रोणाचार्य महर्षि भरद्वाज के पुत्र थे। एक बार जब महर्षि भरद्वाज सुबह गंगा स्नान करने गए, वहां उन्होंने घृताची नामक अप्सरा को जल से निकलते देखा। यह देखकर उनके मन में विकार आ गया और उनका वीर्य स्खलित होने लगा। यह देखकर उन्होंने अपने वीर्य को द्रोण नामक एक बर्तन में संग्रहित कर लिया। उसी में से द्रोणाचार्य का नाम हुआ था।

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  62. प्रश्न 6- हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार इनमें से कौन से ज्योतिर्लिंग की स्थापना चंद्रदेव ने की थी?

    उत्तर- धर्म ग्रंथों के अनुसार चंद्रदेव ने सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना की थी। सोमनाथ भारत का ही नहीं अपितु इस पृथ्वी का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह मंदिर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है। इस मंदिर कि यह मान्यता है, कि जब चंद्रमा को दक्ष प्रजापति ने श्राप दिया था, तब चंद्रमा ने इसी स्थान पर तप कर इस श्राप से मुक्ति पाई थी।

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  63. प्रश्न 7- हिंदू धर्म में श्राद्ध पक्ष कितने दिनों का होता है?

    उत्तर- हिंदू पंचांग के अनुसार श्राद्ध पक्ष 16 दिनों का होता है। श्राद्ध पक्ष भाद्रपद मास की पूर्णिमा से अश्विन मास की अमावस्या तक होता है। इन 16 दिनों में पितरों की आत्मा की शांति के लिए पूजन, तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान आदि करने का विशेष महत्व है।

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  64. प्रश्न 8- हिंदू धर्म में किस ग्रंथ को पांचवे वेद की संज्ञा दी गई है?

    उत्तर- हिंदू धर्म में महाभारत को पांचवां वेद कहा गया है। इसके रचयिता महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास हैं। महर्षि वेदव्यास ने इस ग्रंथ के बारे में स्वयं कहा है- यन्नेहास्ति न कुत्रचित्। अर्थात जिस विषय की चर्चा इस ग्रंथ में नहीं की गई है, उसकी चर्चा अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध नहीं है। श्रीमद्भागवत गीता जैसा अमूल्य रत्न भी इसी महासागर की देन है। इस ग्रंथ में कुल मिलाकर एक लाख श्लोक है, इसलिए इसे शतसाहस्त्री संहिता भी कहा जाता है।

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  65. प्रश्न 9- वाल्मीकि रामायण के अनुसार देवराज इंद्र के रथ के सारथी का नाम क्या है?

    उत्तर- देवराज इंद्र के रथ के सारथि का नाम मातलि है। राम-रावण युद्ध के दौरान जब रावण अपने रथ में बैठकर और श्रीराम भूमि पर खड़े रहकर युद्ध कर रहे थे। उस समय इंद्र ने अपना रथ भगवान श्रीराम की सहायता के लिए भेजा था। उस समय भी मातलि ने ही रथ का संचालन बड़ी कुशलता के साथ किया था।

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  66. प्रश्न 10- धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने किसे सृष्टि के अंत तक पृथ्वी पर भटकने का श्राप दिया था?

    महाभारत के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा को सृष्टि के अंत तक पृथ्वी पर भटकने का श्राप दिया था। गुरु द्रोणाचार्य का विवाह कृपाचार्य की बहन कृपी से हुआ। कृपी के गर्भ से अश्वत्थामा का जन्म हुआ। उसने जन्म लेते ही अच्चै:श्रवा अश्व के समान शब्द किया, इसी कारण उसका नाम अश्वत्थामा हुआ। वह महादेव, यम, काल और क्रोध के सम्मिलित अंश से उत्पन्न हुआ था।


    प्रश्न 11- वाल्मीकि रामायण में कितने श्लोक, उपखंड व कांड हैं?

    उत्तर- रामायण महाकाव्य की रचना महर्षि वाल्मीकि ने की है। इस महाकाव्य में 24 हजार श्लोक, पांच सौ उपखंड तथा उत्तर सहित सात कांड हैं। परमपिता ब्रह्माजी के कहने पर महर्षि वाल्मीकि ने इस ग्रंथ की रचना की थी। सर्वप्रथम लव-कुश ने भगवान श्रीराम के दरबार में इसे गाकर सुनाया था।

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  67. प्रश्न 12- धर्म ग्रंथों के अनुसार देवताओं का सेनापति कौन है?

    उत्तर- धर्म ग्रंथों के अनुसार देवताओं के सेनापति भगवान शिव व माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय हैं। इनका वाहन मोर है। धार्मिक कथाओं के अनुसार ये मोर भगवान विष्णु ने कार्तिकेय को दिया था। देवासुर संग्राम में कार्तिकेय ने ही देवताओं की सेना का प्रतिनिधित्व किया था। ये प्रचंड क्रोधी स्वभाव के हैं। दक्षिण भारत में इन्हें ही मुरुगन स्वामी के रूप में पूजा जाता है।


    प्रश्न 13- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार किस देवी की पूजा करने से नागों का भय नहीं रहता?

    उत्तर- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार मनसादेवी का पूजन करने से नागों का भय नहीं रहता क्योंकि ये देवी नागों के राजा वासुकि की बहन हैं। मनसादेवी के गुरु स्वयं भगवान शिव बताए गए हैं। इन्हीं के पुत्र आस्तीक ने जनमेजय के सर्प यज्ञ को बंद करवाया था। महर्षि आस्तीक का नाम लेने से भी नागों का भय नहीं रहता।

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  68. प्रश्न 14- माता सीता की छाया द्वापर युग में किस रूप में प्रकट हुईं?

    उत्तर- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार रावण ने माता सीता का नहीं उनकी छाया का हरण किया था। इन्हीं छाया रूपी सीता ने द्वापर युग में द्रौपदी के रूप में जन्म लिया था। द्रौपदी पांडवों की पत्नी थी। इनका जन्म अग्नि कुंड से हुआ था। द्रौपदी के पिता का नाम द्रुपद था व इनके भाई का नाम धृष्टद्युम्न। धृष्टद्युम्न का जन्म भी यज्ञ के अग्नि कुंड से हुआ था।


    प्रश्न 15- धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान सूर्यदेव का रथ चलाने वाले सारथी का नाम क्या है?

    उत्तर- भगवान सूर्यदेव का रथ चलाने वाले सारथी का नाम अरुण है। इनकी माता का नाम विनता और पिता का नाम महर्षि कश्यप है। भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ अरुण के छोटे भाई हैं। धर्म ग्रंथों में अरुण की दो संतानें बताई गई हैं- जटायु और संपाति। जटायु ने ही माता सीता का हरण कर रहे रावण से युद्ध किया था और संपाति ने वानरों को लंका का मार्ग बताया था।

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  69. प्रश्न 16- धर्म ग्रंथों में जातिस्मर शब्द का उपयोग किसके लिए किया गया है?

    उत्तर- धर्म ग्रंथों के अनुसार पूर्वजन्म की बातों को याद रखने वाले के लिए जातिस्मर शब्द का उपयोग किया गया है। हिंदू धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता है। आज भी ऐसे कई मामले सामने आते हैं, जिन्हें सुनने के बाद पुनर्जन्म की बातों को सिरे से नकारा नहीं जा सकता। हिंदू धर्म के अनुसार आत्मा सिर्फ शरीर बदलती है। इसे ही पुनर्जन्म कहते हैं।


    प्रश्न 17- महाभारत के अनुसार राजा परीक्षित ने किस ऋषि के गले में मरा हुआ सांप डाला था?

    उत्तर- राजा परीक्षित ने शमीक ऋषि के गले में मरा हुआ सांप डाला था। इससे क्रोधित होकर शमीक ऋषि के पुत्र श्रृंगी ने राजा परीक्षित को सात दिनों के अंदर तक्षक नाग द्वारा काटने से मृत्यु होने का श्राप दिया था। राजा परीक्षित अर्जुन के पोते तथा अभिमन्यु के पुत्र थे। अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए ही राजा जनमेजय ने सर्प यज्ञ किया था।

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  70. प्रश्न 18- हिंदू धर्म में सांप को दूध पिलाने की प्रथा सही है या गलत?

    उत्तर- हिंदू धर्म में सांप को दूध पिलाने का प्रचलन है जो कि पूरी तरह से गलत है। जीव विज्ञान के अनुसार सांप पूरी तरह से मांसाहारी जीव है, ये मेंढक, चूहा, पक्षियों के अंडे व अन्य छोटे-छोटे जीवों को खाकर अपना पेट भरते हैं। दूध इनका प्राकृतिक आहार नहीं है। नागपंचमी के दिन कुछ लोग नाग को दूध पिलाने के नाम पर इन पर अत्याचार करते हैं क्योंकि इसके पहले ये लोग सांपों को कुछ खाने-पीने को नहीं देते। भूखा-प्यासा सांप दूध को पी तो लेता है, लेकिन कई बार दूध सांप के फेफड़ों में घुस जाता है, जिससे उसे निमोनिया हो जाता है और इसके कारण सांप की मौत भी हो जाती है।


    प्रश्न 19- रामायण के अनुसार राजा दशरथ ने किस ऋषि से पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाया था?

    उत्तर- राजा दशरथ द्वारा करवाए गए पुत्रेष्ठि यज्ञ को ऋषि ऋष्यश्रृंग ने संपन्न किया था। ऋष्यश्रृंग के पिता का नाम महर्षि विभाण्डक था। एक दिन जब वे नदी में स्नान कर रहे थे, तब नदी में उनका वीर्यपात हो गया। उस जल को एक हिरणी ने पी लिया था, जिसके फलस्वरूप ऋषि ऋष्यश्रृंग का जन्म हुआ था। इस यज्ञ के फलस्वरूप ही भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न का जन्म हुआ था।

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  71. प्रश्न 20- धर्म ग्रंथों के अनुसार चंद्रमा की कितनी पत्नियां है?

    उत्तर- धर्म ग्रंथों के अनुसार चंद्रमा की 27 पत्नियां हैं। इनमें से रोहिणी नाम की पत्नी चंद्रमा को विशेष प्रिय है। रोहिणी से विशेष प्रेम करने और अन्य के साथ भेद-भाव करने के कारण ही प्रजापति दक्ष ने चंद्रमा को क्षय रोग होने का श्राप दिया था। चंद्रमा द्वारा भगवान शिव की उपासना करने से ही उन्हें इस श्राप से मुक्ति मिली थी। चंद्रमा की ये 27 पत्नियां वास्तव में 27 नक्षत्र हैं।


    प्रश्न 21- क्यों सांप बीन की धुन पर नाचता है?
    उत्तर- खेल-तमाशा दिखाने वाले कुछ लोग सांप को अपनी बीन की धुन पर नचाने का दावा करते हैं, जबकि ये पूरी तरह से अंधविश्वास है क्योंकि सांप के तो कान ही नहीं होते। दरअसल ये मामला सांपों की देखने और सुनने की शक्तियों और क्षमताओं से जुड़ा है। सांप हवा में मौजूद ध्वनि तरंगों पर प्रतिक्रिया नहीं दर्शाते पर धरती की सतह से निकले कंपनों को वे अपने निचले जबड़े में मौजूद एक खास हड्डी के जरिए ग्रहण कर लेते हैं।

    सांपों की नजर ऐसी है कि वह केवल हिलती-डुलती वस्तुओं को देखने में अधिक सक्षम हैं बजाए स्थिर वस्तुओं के। सपेरे की बीन को इधर-उधर लहराता देखकर नाग उस पर नजर रखता है और उसके अनुसार ही अपने शरीर को लहराता है और लोग समझते हैं कि सांप बीन की धुन पर नाच रहा है।

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  72. प्रकृति ने हमें अनेक रंग प्रदान किए हैं परंतु वे सभी अलग-अलग प्रभाव हमारे जीवन में डालते हैं। भवन का रंग-रोगन करवाने से पूर्व कुंडली के ग्रहों पर भी विचार अवश्य करना चाहिए। वास्तु शास्त्र के अंतर्गत इस विषय में कुछ ध्यान रखने योग्य बातें हैं, जो इस प्रकार हैं-

    1- वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में काले रंग का उपयोग (फर्श आदि में) नहीं करना चाहिए। काले रंग या पत्थर का अधिक उपयोग करने से राहु का प्रभाव जीवन में अधिक पड़ता है, जिससे समस्याएं हो सकती हैं।

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  73. 2- यदि शुक्र उच्च व केंद्र या त्रिकोण में हो या मित्र क्षेत्री हो तो भवन की साज-सज्जा में पीले व सफेद रंग का प्रयोग शुभ है।

    3- यदि गुरु अशुभ, शत्रु व निर्बल है तो पीले व सफेद रंग का प्रयोग परिवार में विरोध बढ़ाता है।

    4- गुरु-शुक्र का संबंध होने पर भी पीले व सफेद रंग का अधिक प्रयोग आत्म-क्लेश की स्थिति बनाता है।

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  74. 5- यदि भवन स्वामी की कुंडली में शुक्र उच्च हो तो सफेद रंग शुभकारक होता है और यदि शुक्र निर्बल हो तो भवन में सफेद रंग का उपयोग बिल्कुल नहीं करना चाहिए।

    6- भवन में सफेद रंग का अधिक उपयोग करना भी ठीक नहीं है। ऐसा करने से गृहस्थ जीवन अत्यधिक महत्वाकांक्षी हो जाएगा, जो भविष्य में विलासिता व भोग के कारण दु:ख का कारण बन सकता है।

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  75. 19 जून 2014 को गुरु कर्क राशि में प्रवेश करेगा। हालांकि, गुरु के राशि परिवर्तन को लेकर अलग-अलग पंचांगों में अलग-अलग तिथि बताई गई है। अधिकांश पंचांगों के अनुसार गुरु ग्रह 19 जून को ही मिथुन राशि से कर्क राशि में प्रवेश करेगा। कर्क राशि चंद्रमा के स्वामित्व वाली राशि है। इस राशि में 5 डिग्री तक आने पर गुरु उच्च का हो जाएगा। शेष समय में मित्र राशि में माना जाएगा।

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  76. आजाद भारत की राशि भी कर्क ही है, गुरु का इस राशि में आना देश के लिए उत्तम समय लेकर आएगा। आम जनता को सरकार की ओर से राहत मिलेगी। 2 नवंबर 2014 तक कर्क पर शनि का ढय्या भी रहेगा, फिर भी इस राशि के लोगों को विशेष लाभ प्राप्त होगा। गुरु के प्रभाव से कर्क राशि के लोगों को कोई बड़ा पद एवं नई जिम्मेदारी मिलने की संभावनाएं बन रही हैं। धन लाभ भी होगा।

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  78. मंगल ग्रह को ज्योतिष शास्त्र में सभी ग्रहों का सेनापति माना गया है। इसी वजह से मंगल का प्रभाव भी काफी अधिक होता है। मंगल किसी भी व्यक्ति के स्वभाव को पूरी तरह प्रभावित करता है।

    कुंडली में बारह भाव होते हैं और हर भाव में मंगल का अलग-अलग असर होता है। किसी व्यक्ति के जन्म के समय मंगल कुंडली के जिस भाव में स्थित होता है, उसका वैसा ही असर जीवनभर बने रहता है।

    अपनी कुंडली में देखिए मंगल किस भाव में स्थित है और यहां जानिए उस स्थिति के अनुसार मंगल आपके जीवन को किस प्रकार प्रभावित कर रहा है...

    प्रथम भाव में मंगल हो तो...
    ज्योतिष के अनुसार कुंडली के प्रथम भाव में मंगल हो तो व्यक्ति साहसी, अल्पायु, अभिमानी, शूरवीर, सुंदर रूप वाला और चंचल हो सकता है।

    द्वितीय भाव में मंगल हो तो...
    ऐसा व्यक्ति निर्धन, कुरूप, नीच लोगों के साथ रहने वाला हो सकता है, जिसकी कुंडली के द्वितीय भाव में मंगल स्थित होता है। इस स्थिति के कारण व्यक्ति विद्याहीन अथवा कम बुद्धि वाला भी हो सकता है।

    तृतीय भाव में मंगल हो तो...
    कुंडली के तृतीय भाव में मंगल हो तो वह व्यक्ति शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला होता है। ऐसे लोगों को भाई-बहन की ओर से पूर्ण सुख प्राप्त नहीं हो पाता है। सामान्यत: ऐसे लोग समाज में प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं।

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  79. चतुर्थ भाव में मंगल हो तो...

    किसी व्यक्ति की कुंडली में मंगल चौथे भाव में हो तो, वह व्यक्ति घर, वस्त्र और भाई-बंधु से पूर्ण सुख प्राप्त नहीं कर पाता है। मंगल की इस स्थिति के कारण व्यक्ति वाहन सुख भी प्राप्त नहीं कर पाता है।

    पंचम भाव में मंगल हो तो...

    जिन लोगों की कुंडली के पंचम भाव में मंगल स्थित होता है, वे लोग सुख, धन और पुत्र के संबंध में परेशानियों का सामना करते हैं। इनकी बुद्धि बुद्धि होती है। मंगल के कारण ये लोग अशांत रहते हैं।

    छठे भाव में मंगल हो तो...

    कुंडली के छठे भाव में मंगल स्थित हो तो व्यक्ति कामुक होता है। मंगल के कारण ऐसे लोग दिखने सुंदर और बलवान होते हैं। ये लोग समाज में प्रतिष्ठा पाने वाले होते हैं।

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  80. आज शुक्रवार 27 जून को अमावस्या तिथि है !शास्त्रों में अमावस्या तिथि का स्वामी पितृदेव को माना जाता है। इसलिए इस दिन पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण, दान-पुण्य का महत्व है।

    अमावस्या के दिन सोम, मंगलवार और गुरुवार के साथ जब अनुराधा, विशाखा और स्वाति नक्षत्र का योग बनता है, तो यह बहुत पवित्र योग माना गया है।

    इसी तरह शनिवार और चतुर्दशी का योग भी विशेष फल देने वाला माना जाता है। ऐसे योग होने पर अमावस्या के दिन तीर्थस्नान, जप, तप और व्रत के पुण्य से ऋण या कर्ज और पापों से मिली पीड़ाओं से छुटकारा मिलता है। इसलिए यह संयम, साधना और तप के लिए श्रेष्ठ दिन माना जाता है।

    पुराणों में अमावस्या को कुछ विशेष व्रतों के विधान बताए हैं। ये हैं-

    अमावस्या पयोव्रत- इस व्रत में केवल पीने के लिए दूध ही ग्रहण किया जाता है। भगवान विष्णु की आराधना की जाती है। यह व्रत एक वर्ष तक किया जाता है। इससे तन, मन और धन के कष्टों से मुक्ति मिलती है।

    अमावस्या व्रत- कूर्म पुराण के अनुसार इस दिन शिवजी की आराधना के साथ व्रत किया जाता है, जो व्रती की गंभीर पीड़ाओं का शमन करता है।

    वट सावित्री व्रत- पति की लंबी उम्र व परिवार की खुशहाली के लिए ज्येष्ठ अमावस्या पर भी यह व्रत रखने का विधान है।

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  81. जीवन में आने वाले ऐसे ही संकटों से रक्षा के लिए धर्मशास्त्रों में जगतजननी देवी दुर्गा के 9 दिव्य स्वरूपों यानी नवदुर्गा के स्मरण की मंत्र स्तुति का शुक्रवार, नवमी तिथि या नवरात्रि की शुभ घड़ी में पाठ का महत्व बताया गया है। यह देवी के रक्षा कवच के रूप में हर संकट में रक्षक माना गया है। जानिए, नवदुर्गा की अद्भुत स्तुति-

    - शुक्रवार को देवी दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर की लाल पूजा सामग्रियों जैसे लाल चंदन, लाल फूल, वस्त्र या चुनरी व नैवेद्य अर्पित कर नीचे लिखी मंत्र स्तुति का पाठ करें-

    प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।

    तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।।

    पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।

    सप्तमं कालरात्रीति महागौरीतिचाष्टकम् ।।

    नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।

    उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ।।

    अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्येगतोरणे।

    विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः।।

    न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।

    नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि।।

    - मंत्र स्तुति के बाद धूप व दीप से देवी आरती कर घर-परिवार की विपत्तियों और संकटों से रक्षा की प्रार्थना करें।

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  82. हृदय-मंदिर के अंदर संतोष
    जब कभी किसी दु:खद घटना
    से तुम्हारा मन खिन्न हो रहा हो, निराशा के बादल चारों ओर
    से छाए हुए हों, असफलता के कारण चित्त
    दु:खी बना हुआ हो, भविष्य की भयानक आशंका
    सामने खड़ी हुई हो, बुद्धि
    किंकत्र्तव्यविमूढ़ हो रही हो, तो इधर-उधर मत भटको। उस
    लोमड़ी को देखो, वह शिकारी कुत्तों से
    घिरने पर भाग कर अपनी गुफा में घुस जाती है और वहाँ संतोष की साँस लेती है।
    ऐसे विषम अवसरों पर सब ओर
    से अपने चित्त को हटा लो और अपने हृदय-मंदिर में चले जाओ। बाहर की समस्त बातों को
    बिलकुल भूल जाओ। पाप-तापों को द्वार पर छोड़ कर जब भीतर जाने लगोगे तो मालूम
    पड़ेगा कि एक बड़ा भारी बोझ, जिसके भार से गरदन टूटी
    जा रही थी, उतर गया और तुम बहुत ही
    हलके, रुई के टुकड़े की तरह
    हलके हो गए हो। हृदय-मंदिर में इतनी शांति मिलेगी,
    जितनी
    ग्रीष्म से तपे हुए व्यक्ति को बर्फ से भरे हुए कमरे में मिलती है। कुछ ही देर में
    आनंद की झपकियाँ लेने लगोगे।
    हृदय के इस सात्विक स्थान
    को ब्रह्मलोक या गोलोक भी कहते हैं; क्योंकि इसमें पवित्रता, प्रकाश और शांति का ही निवास है। परमात्मा ने हमें स्वर्ग-सोपान
    सुख प्राप्त करने के लिए दिया है,

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  83. इस संसार की श्रेष्ठतम विभूति-ज्ञान
    सच्चा ज्ञान वह है, जो हमें हमारे गुण, कर्म, स्वभाव की त्रुटियाँ
    सुझाने, अच्छाइयाँ बढ़ाने एवं
    आत्मनिर्माण की प्रेरणा प्रस्तुत करता है। यह सच्चा ज्ञान ही हमारे स्वाध्याय और
    सत्संग का, चिंतन और मनन का विषय
    होना चाहिए।
    कहते हैं कि संजीवनी बूटी
    का सेवन करने से मृतक व्यक्ति भी जीवित हो जाते हैं। हनुमान द्वारा पर्वत समेत यह
    बृटी लक्ष्मण जी की मूच्र्छा जगाने के लिए काम में लाई गई थी। वह अभी औषधि रूप में
    तो मिलती नहीं है, पर सूक्ष्म रूप में अभी
    भी मौजूद है। आत्मनिर्माण की विद्या संजीवनी विद्या कही जाती है, इससे मूर्छत पड़ा हुआ मृतक तुल्य अंत:करण पुन: जाग्रत् हो जाता है
    और प्रगति में बाधक अपनी आदतों को, विचार-शृंखलाओं को
    सुव्यवस्थित बनाने में लग कर अपने आप का कायाकल्प ही कर लेता है।
    सुधरी विचारधारा का
    मनुष्य ही देवता कहलाता है। कहते हैं, देवता स्वर्ग में रहते
    हैं। देव-वृत्तियों वाले मनुष्य जहाँ कहीं भी रहते हैं, वहाँ स्वर्ग जैसी परिस्थितियाँ अपने आप बन जाती हैं। अपने को
    सुधारने से चारों ओर बिखरी हुई परिस्थितियाँ उसी प्रकार सुधर जाती हैं, जैसे दीपक के जलते ही चारों ओर फैला हुआ अँधेरा उजाले में बदल जाता
    है।

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  84. हिंदू धर्म के अनुसार एक वर्ष में चार नवरात्रि होती है, लेकिन आमजन केवल दो नवरात्रि (चैत्र व शारदीय नवरात्रि) के बारे में ही जानते हैं। आषाढ़ तथा माघ मास की नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि कहा जाता है, इनके बारे में लोग कम ही जानते हैं। इस बार आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि का प्रारंभ आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा (28 जून, शनिवार) से हो रहा है, जो आषाढ़ शुक्ल नवमी (6 जुलाई, रविवार) को समाप्त होगी।

    आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि में वामाचार पद्धति से उपासना की जाती है। यह समय शाक्य एवं शैव धर्मावलंबियों के लिए पैशाचिक, वामाचारी क्रियाओं के लिए अधिक शुभ एवं उपयुक्त होता है। इसमें प्रलय एवं संहार के देवता महाकाल एवं महाकाली की पूजा की जाती है।

    इस गुप्त नवरात्रि में संहारकर्ता देवी-देवताओं के गणों एवं गणिकाओं अर्थात भूत-प्रेत, पिशाच, बैताल, डाकिनी, शाकिनी, खण्डगी, शूलनी, शववाहनी, शवरूढ़ा आदि की साधना की जाती है। ऐसी साधनाएं शाक्त मतानुसार शीघ्र ही सफल होती हैं। दक्षिणी साधना, योगिनी साधना, भैरवी साधना के साथ पंचमकार (मद्य, मछली, मुद्रा, मैथुन, मांस) की साधना भी इसी नवरात्रि में की जाती है।

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  85. साल में कब-कब आती है नवरात्रि, जानिए

    हिंदू धर्म के अनुसार एक वर्ष में चार नवरात्रि होती है। वर्ष के प्रथम मास अर्थात चैत्र में प्रथम नवरात्रि होती है। चौथे माह आषाढ़ में दूसरी नवरात्रि होती है। इसके बाद अश्विन मास में प्रमुख नवरात्रि होती है। इसी प्रकार वर्ष के ग्यारहवें महीने अर्थात माघ में भी गुप्त नवरात्रि मनाने का उल्लेख एवं विधान देवी भागवत तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों में मिलता है।

    अश्विन मास की नवरात्रि सबसे प्रमुख मानी जाती है। इस दौरान गरबों के माध्यम से माता की आराधना की जाती है। दूसरी प्रमुख नवरात्रि चैत्र मास की होती है। इन दोनों नवरात्रियों को क्रमश: शारदीय व वासंती नवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है।

    आषाढ़ तथा माघ मास की नवरात्रि गुप्त रहती है। इसके बारे में अधिक लोगों को जानकारी नहीं होती। इसलिए इन्हें गुप्त नवरात्रि कहते हैं। गुप्त नवरात्रि विशेष तौर पर गुप्त सिद्धियां पाने का समय है। साधक इन दोनों गुप्त नवरात्रि में विशेष साधना करते हैं तथा चमत्कारिक शक्तियां प्राप्त करते हैं।

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  86. पहले दिन करें मां शैलपुत्री का पूजन

    गुप्त नवरात्रि के पहले दिन (28 जून, शनिवार) को मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार देवी का यह नाम हिमालय के यहां जन्म होने से पड़ा। हिमालय हमारी शक्ति, दृढ़ता, आधार व स्थिरता का प्रतीक है। मां शैलपुत्री को अखंड सौभाग्य का प्रतीक भी माना जाता है।
    नवरात्रि के प्रथम दिन योगीजन अपनी शक्ति मूलाधार में स्थित करते हैं व योग साधना करते हैं।

    हमारे जीवन प्रबंधन में दृढ़ता, स्थिरता व आधार का महत्व सर्वप्रथम है। अत: इस दिन हमें अपने स्थायित्व व शक्तिमान होने के लिए माता शैलपुत्री से प्रार्थना करनी चाहिए। शैलपुत्री का आराधना करने से जीवन में स्थिरता आती है। हिमालय की पुत्री होने से यह देवी प्रकृति स्वरूपा भी है। स्त्रियों के लिए उनकी पूजा करना ही श्रेष्ठ और मंगलकारी है।

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  87. दूसरे दिन करें मां ब्रह्मचारिणी की उपासना

    गुप्त नवरात्रि के दूसरे दिन (29 जून, रविवार) मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है। देवी ब्रह्मचारिणी ब्रह्म शक्ति यानि तप की शक्ति का प्रतीक हैं। इनकी आराधना से भक्त की तप करने की शक्ति बढ़ती है। साथ ही सभी मनोवांछित कार्य पूर्ण होते हैं।

    ब्रह्मचारिणी हमें यह संदेश देती हैं कि जीवन में बिना तपस्या अर्थात कठोर परिश्रम के सफलता प्राप्त करना असंभव है। बिना श्रम के सफलता प्राप्त करना ईश्वर के प्रबंधन के विपरीत है। अत: ब्रह्मशक्ति अर्थात समझने व तप करने की शक्ति हेतु इस दिन शक्ति का स्मरण करें। योग शास्त्र में यह शक्ति स्वाधिष्ठान में स्थित होती है। अत: समस्त ध्यान स्वाधिष्ठान में करने से यह शक्ति बलवान होती है एवं सर्वत्र सिद्धि व विजय प्राप्त होती है।

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  88. किसी भी प्रकार की पूजा-अर्चना के लिए पुरुषों को धोती पहनना चाहिए, यह प्राचीन परंपरा है। आज भी कई स्थानों पर पुरुषों के लिए पूजा के समय धोती पहनना अनिवार्य नियम है। वैसे तो धोती पहनने का चलन बहुत कम हो गया है और पूजन आदि कर्मों में धोती की अनिवार्यता ब्राह्मणों तक ही सीमित रह गई है। प्राचीनकाल में धोती पहने बिना पूजादि कर्मकांड पूर्ण नहीं माने जाते थे। इसी वजह से धोती को पवित्र परिधान माना गया है।

    धोती पहनने का वैज्ञानिक महत्व

    धोती पहनने की अनिवार्यता के पीछे वैज्ञानिक महत्व भी है। पूजा-अर्चना जैसे कार्यों में काफी देर तक एक विशेष अवस्था में श्रद्धालु को बैठे रहना पड़ता है, उस दशा में धोती से अच्छा कोई और परिधान नहीं हो सकता है। आजकल लोग जींस, पेंट आदि पहनकर ही पूजा कार्य करते हैं, जिससे बैठने-उठने में कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। शरीर के रोमछिद्रों से हमें शुद्ध प्राणवायु मिलती है, तंग कपड़े न सिर्फ इसमें बाधा डालते हैं बल्कि रक्तप्रवाह पर भी बुरा असर डालते हैं। इसलिए स्वास्थ्य की दृष्टि से भी धोती पहनना लाभदायक है। धोती बारिक सूती कपड़े से बनी होती है, जो कि हवादार और सुविधाजनक होती है। इसी वजह से पूजन कर्म के लिए धोती श्रेष्ठ परिधान है।

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  89. विवाह के बाद कुछ दंपत्तियों को कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इन परेशानियों के कारण वैवाहिक जीवन से सुख और समृद्धि गायब हो जाती है। ऐसी परिस्थिति में पति-पत्नी को आपसी समझदारी से काम लेना चाहिए, साथ ही ज्योतिष के अनुसार बताए गए कुछ उपाय भी करना चाहिए।

    क्यों करें ज्योतिष के उपाय...

    यदि पति-पत्नी के बीच की परेशानियां कुंडली में स्थित ग्रह दोषों के कारण उत्पन्न हो रही हैं तो उनका उपचार ज्योतिषीय उपायों से ही किया जा सकता है। पति-पत्नी अपनी-अपनी कुंडली के लग्न अनुसार उपाय करेंगे तो वैवाहिक जीवन की कई समस्याएं स्वत: ही समाप्त हो जाएंगी। कुंडली के प्रथम भाव को लग्न भाव कहा जाता है। यह भाव जिस राशि का होता है, कुंडली उसी राशि के लग्न की मानी जाती है।

    यहां जानिए कुंडली के लग्न अनुसार किए जाने वाले उपाय, जो पति-पत्नी के वैवाहिक जीवन को सुखी बना सकते हैं...


    कुंडली का मेष लग्न

    मेष लग्न के लोगों के लिए दांपत्य सुख का कारक शुक्र ग्रह होता है। ये लोग वैवाहिक सुख पाने के लिए नियमित रूप से गाय व पक्षियों को चावल खिलाएं। स्त्रियां मां पार्वती को समर्पित सिंदूर अपनी मांग में लगाएं।

    कुंडली का वृष लग्न

    वृष लग्न के लोगों के लिए दांपत्य सुख के सप्तम भाव का कारक मंगल ग्रह होता है। वृष लग्न के व्यक्ति लाल वस्त्र में सौंफ बांधकर अपने शयनकक्ष में रखें और इसे समय-समय पर बदलते रहें।

    कुंडली का मिथुन लग्न

    जिन लोगों की कुंडली मिथुन लग्न की है, उनकी कुंडली में दांपत्य सुख का कारक गुरु ग्रह होता है। इस लग्न के लोगों को गुरुवार का व्रत रखना चाहिए और इस दिन एक समय भोजन करना चाहिए। साथ ही, शिवलिंग पर चने की दाल अर्पित करें।

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  90. कुंडली का कर्क लग्न

    कर्क लग्न की कुंडली में वैवाहिक जीवन के भाव का कारक शनि ग्रह होता है। अधिकांश मामलों में इस लग्न के लोगों का दांपत्य जीवन बहुत सुखी नहीं कहा जा सकता। शनिवार व मंगलवार की शाम पति-पत्नी हनुमानजी के दर्शन करने जाएं। साथ ही, हनुमान चालीसा का पाठ करें।

    कुंडली का सिंह लग्न

    जिन लोगों की कुंडली सिंह लग्न की है, उनकी कुंडली में वैवाहिक सुख का कारक शनि होता है। ये लोग शनिपुष्य नक्षत्र में नाव की कील से बना छल्ला मध्यमा उंगली में धारण करें।

    कुंडली का कन्या लग्न

    कन्या लग्न की कुंडली में दांपत्य सुख का कारक ग्रह बृहस्पति होता है। इस लग्न के लोगों को भगवान लक्ष्मीनारायण की आराधना करनी चाहिए। साथ ही, हर गुरुवार को केले के पौधे में जल अर्पित करें।

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  91. कुंडली का तुला लग्न

    तुला लग्न की कुंडली में दांपत्य सुख का कारक ग्रह मंगल होता है। इस लग्न के लोगों को मंगलवार का व्रत रखना चाहिए। दिन में एक समय भोजन करें और भोजन में मीठा व्यंजन अवश्य शामिल करें। साथ ही, शिवलिंग पर लाल पुष्प अर्पित करें।


    कुंडली का वृश्चिक लग्न

    वृश्चिक लग्न की कुंडली में दांपत्य सुख का कारक ग्रह शुक्र है। अत: शुक्र को प्रसन्न करने के लिए किसी ऐसे स्थान पर जाएं, जहां मछलियां हों और वहां मछलियों को मिश्रीयुक्त उबले चावल खिलाएं।

    कुंडली का धनु लग्न

    धनु लग्न के लोगों के लिए दांपत्य सुख का कारक बुध ग्रह है। इन लोगों को भगवान गणपति की आराधना करनी चाहिए। हर बुधवार गणेशजी को दूर्वा अर्पित करें।

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  92. दशम भाव में मंगल हो तो...

    कुंडली के दसवें भाव में मंगल हो तो व्यक्ति सभी कार्य करने में दक्ष होता है। इन्हें शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। मंगल इन्हें श्रेष्ठ बनाता है। ये लोग पुत्र सुख प्राप्त करने वाला होते हैं।

    एकादश भाव में मंगल हो तो...

    कुंडली के ग्याहरवें भाव में मंगल हो तो व्यक्ति गुणी और सुखी होता है। मंगल की यह स्थिति व्यक्ति को धनवान बनाती है। इन लोगों को पुत्र संतान का सुख प्राप्त होता है।

    द्वादश भाव में मंगल हो तो...

    कुंडली के बाहरवें भाव में मंगल हो तो वह व्यक्ति आंखों का रोगी हो सकता है। मंगल की यह स्थिति व्यक्ति को चुगलखोर बना सकती है। ऐसे व्यक्ति के जीवन में कई बार कठिन परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं।

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  93. कुंडली का मकर लग्न

    मकर लग्न की कुंडली में दांपत्य सुख का कारक चंद्रमा होता है। अत: इन लोगों को गौरीशंकर रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। साथ ही, चांदी का बना चंद्रमा यंत्र गंगा जल से पवित्र करके पूजा घर में रखें। हर पूर्णिमा पर गंगा जल से इस यंत्र को स्नान कराएं और नियमित रूप से पूजन करें।

    कुंडली का कुंभ लग्न

    यदि किसी व्यक्ति की कुंडली कुंभ लग्न की है तो उसमें वैवाहिक सुख का कारक सूर्य ग्रह है। कारक ग्रह को प्रसन्न करने के लिए प्रतिदिन सूर्य को तांबे के लोटे से जल अर्पित करें।

    कुंडली का मीन लग्न

    जिन लोगों की कुंडली मीन लग्न की है, उनकी कुंडली में दांपत्य सुख का कारक ग्रह बुध होता है। इन लोगों को हर बुधवार भगवान गणेश की पूजा करनी चाहिए। पूजन के बाद किसी गाय को हरी घास भी खिलाएं।

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  94. कुंडली का नवम भाव भाग्य का स्थान माना जाता है। इस लग्न की कुंडली में नवां स्थान मकर राशि का स्वामी शनि है। शनि और केतु मित्र ग्रह माने जा